छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९
| दैवतं चोभयं ब्रह्मदृष्टिविषयमादिष्टमुपदिष्टं भवति, आकाशमनसोः सूक्ष्मत्वात् मनसोपलभ्यत्वाच्च ब्रह्मणो योग्यं मनो ब्रह्मदृष्टेः । आकाशश्च, सर्वगतत्वात्सूक्ष्मत्वादुपाधिहीनत्वाच्च ॥१॥ | अधिदैवत दोनों प्रकारकी ब्रह्मदृष्टिके विषयमें आदेश—उपदेश किया जाता है; क्योंकि आकाश और मन दोनों ही सूक्ष्म हैं। इसके सिवा, ब्रह्म मनसे उपलब्ध किया जा सकता है, इसलिये भी मन ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, तथा सर्वगत, सूक्ष्म और उपाधिहीन होनेके कारण आकाश भी ब्रह्मदृष्टिके योग्य है ॥१॥ |
तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म । वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥
वह यह (मनःसंज्ञक) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते हैं—अग्नि पाद है, वायु पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया ॥ २ ॥
| तदेतन्मनआख्यं चतुष्पाद्ब्रह्म, चत्वारः पादा अस्येति । कथं चतुष्पात्त्वं मनसो ब्रह्मणः ? इत्याह—वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्र- | वह यह मनसंज्ञक ब्रह्म चतुष्पाद् है। जिसके चार पाद हों उसे चतुष्पाद् कहते हैं। यह मनोब्रह्म चतुष्पाद् किस प्रकार है ? यह श्रुति बतलाती है—वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र—ये इसके पाद हैं। यह अध्यात्म- |