भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 978 में से

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पृष्ठ 344
३४०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ३

| मित्येते पादा इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमाकाशस्य ब्रह्मणोऽग्निर्वायुरादित्यो दिश इत्येते । एवमुभयमेव चतुष्पाद्ब्रह्मादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥ | दृष्टि है । अब अधिदैवत बतलाते हैं—आकाशसंज्ञक ब्रह्मके अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ ये पाद हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका आदेश किया गया ॥ २ ॥ |


तत्र—उनमें—

वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥

वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ॥ ३ ॥

| वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पाद इतरपादत्रयापेक्षया । वाचा हि पादेनेव गवादि वक्तव्यविषयं प्रति तिष्ठति । अतो मनसः पाद इव वाक् । तथा प्राणो घ्राणः पादः । तेनापि गन्धविषयं प्रति च क्रामति । तथा चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद | वाक् ही मनरूप ब्रह्मका, अन्य तीन पादोंकी अपेक्षा चौथा पाद है । जिस प्रकार गौ आदि जीव पादद्वारा इष्ट स्थानपर जाकर उपस्थित होते हैं उसी प्रकार वाणीसे ही मन वक्तव्य विषयपर ठहरता है। अतः वाक् मनके पादके समान है। इसी प्रकार प्राण—घ्राण भी उसका पाद है । उसके द्वारा भी वह गन्धरूप विषयके प्रति जाता है । ऐसे ही चक्षु पाद है और श्रोत्र भी पाद है । इस प्रकार यह |