छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 342, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 342
अष्टादश खण्ड
— : ० : —
मन आदि दृष्टिसे अध्यात्म और आधिदैविक ब्रह्मोपासना
| मनोमय ईश्वर उक्त आकाशात्मेति च ब्रह्मणो गुणैकदेशत्वेन। अथेदानीं मनआकाशयोः समस्तब्रह्मदृष्टिविधानार्थ आरम्भो मनो ब्रह्मेत्यादि— | [चतुर्दश खण्डके द्वितीय मन्त्रमें] ईश्वरके गुणोंके एकदेशको लेकर उसे मनोमय और आकाशात्मा कहा गया है। अब इससे आगे मन और आकाशमें समस्त ब्रह्मदृष्टिका विधान करनेके लिये 'मनो ब्रह्म' इत्यादि [अष्टादश खण्ड] का आरम्भ किया जाता है— |
मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥१॥
'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे। यह अध्यात्मदृष्टि है। तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवतदृष्टि है। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया ॥ १ ॥
| मनो मनुतेऽनेनेत्यन्तःकरणं तद्ब्रह्म परमित्युपासीतेति, एतदात्मविषयं दर्शनमध्यात्मम्। अथाधिदैवतं देवताविषयमिदं वक्ष्यामः। आकाशो ब्रह्मेत्युपासीत। एवमुभयमध्यात्ममधि- | मन—जिससे प्राणी मनन करता है उस अन्तःकरणको मन कहते हैं। वह परब्रह्म है—ऐसी उपासना करे। यह आत्मविषयक दर्शन अध्यात्म है। अब यह अधिदैवत—देवताविषयक दर्शन कहते हैं। आकाश ब्रह्म है—ऐसी उपासना करे। इस प्रकार अध्यात्म और |