छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 341, कुल 978 में से
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| खण्ड १७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३३७ |
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| आदित्यस्थं च तदेकं ज्योतिः। यदुत्तरमुत्कृष्टतरमूर्ध्वतरं वापरं ज्योतिरपेक्ष्य पश्यन्त उदगन्म वयम्।<br><br>कमुदगन्म ? इत्याह—देवं द्योतनवन्तं देवेषु सर्वेषु सूर्य रसानां रश्मीनां प्राणानां च जगत ईरणात्सूर्यस्तमुदगन्म गतवन्तो ज्योतिरुत्तमं सर्वज्योतिर्भ्य उत्कृष्टतममहो प्राप्ता वयमित्यर्थः।<br><br>इदं तज्ज्योतिर्यदृग्भ्यां स्तुतं यद्यजुस्त्रयेण प्रकाशितम्। द्विरभ्यासो यज्ञकल्पनापरिसमाप्त्यर्थः॥ ७ ॥ | अन्तःकरणमें स्थित तेज और आदित्यमें स्थित तेज एक ही है, जिस अन्य तेजोंकी अपेक्षा उत्तर—उत्कृष्टतर अर्थात् ऊर्ध्वतर तेजको देखते हुए हम प्राप्त हुए।<br><br>किसे प्राप्त हुए—यह श्रुति बतलाती है—समस्त देवताओंमें देव अर्थात् द्योतनवान् सूर्यको प्राप्त हुए; जो रस, किरण और संसारके प्राणोंको प्रेरित करनेके कारण सूर्य कहलाता है उस उत्तम ज्योतिको—सम्पूर्ण ज्योतियोंमें उत्कृष्टतम ज्योतिको प्राप्त हुए; अहो! [आश्चर्य है कि ] हम उसे प्राप्त हुए—ऐसा इसका तात्पर्य है। यही वह ज्योति है जिसकी दो ऋचाओंने स्तुति की है तथा जो उपर्युक्त तीन यजुःश्रुतियोंद्वारा प्रकाशित है। 'ज्योतिरुत्तमं ज्योतिरुत्तमम्' यह द्विरुक्ति यज्ञकल्पनाकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ७ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये<br>सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
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