छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| विद्यां प्रति तृड्विच्छेदकरीति पुरुषयज्ञविद्यां स्तौति । | का छेदन करनेवाली हुई' —ऐसा कहकर श्रुति पुरुषयज्ञविद्याकी स्तुति करती है । | | घोर आङ्गिरसः कृष्णायोक्त्वेमां विद्यां किमुवाच ? इति तदाहस एवं यथोक्तयज्ञविदन्तवेलायां मरणकाल एतन्मन्त्रत्रयं प्रतिपद्येत जपेदित्यर्थः । | घोर आङ्गिरसने कृष्णके प्रति यह विद्या कहकर क्या कहा—यह बतलाते हैं—पूर्वोक्त यज्ञविद्याको जाननेवाला वह पुरुष अन्तिम समय-मरणकाल उपस्थित होनेपर इन तीन मन्त्रोंको प्रतिपन्न हो अर्थात् इनका जप करे । वह मन्त्र कौन-से हैं ? | | किं तत् ? अक्षितमक्षीणमक्षतं वासीत्येकं यजुः । सामर्थ्यादित्यस्थं प्राणं चैकीकृत्याह— तथा तमेवाहाच्युतं स्वरूपादप्रच्युतमसीति द्वितीयं यजुः । | 'तू अक्षित—अक्षीण अथवा अक्षय है' यह एक यजु है । प्रसङ्गके सामर्थ्यसे यह कथन आदित्यस्थ पुरुष और प्राणकी एकता करके किया गया है। तथा उसीके प्रति श्रुति कहती है—'तू अच्युत—स्वरूपसे च्युत न होनेवाला है—यह दूसरा यजु है । | | प्राणसंशितं प्राणश्च स संशितं सम्यक्तनूकृतं च सूक्ष्मं तत्त्वमसीति तृतीयं यजुः । तत्रैतस्मिन्नर्थे विद्यास्तुतिपरे द्वे ऋचौ मन्त्रौ भवतः, न जपार्थे, त्रयं प्रतिपद्येतेति त्रित्वसंख्याबाध- | 'तू प्राणसंशित—जो प्राण संशित—सम्यक् प्रकारसे तनु यानी सूक्ष्म किया गया है वह तू है'—यह तीसरा यजु है । इस अर्थमें इस विद्याकी स्तुति करनेवाली दो ऋचाएँ यानी दो मन्त्र हैं, किंतु वे जपके लिये नहीं हैं, क्योंकि पहले जो 'त्रयं प्रतिपद्येत' ( तीनका जप करे ) ऐसी विधि की गयी है उसकी 'तीन संख्याका बाध हो |