छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १७ ] शाङ्करभाष्य ३३५
| नात्; पञ्चसंख्या हि तदा स्यात् ॥ ६ ॥ | जायगा और तब 'पाँच' संख्या हो जायगी ॥ ६ ॥ |
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आदित्प्रत्नस्य रेतसः । उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरꣳस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥
[ 'आदित्प्रत्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि'* इसका अर्थ यह है—] पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश, जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है। [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें प्रकाशमान सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥ ७ ॥
| आदितित्यत्राकारस्यानुबन्धस्तकारोऽनर्थक इच्छब्दश्च। प्रत्नस्य चिरन्तनस्य पुराणस्येत्यर्थः, रेतसः कारणस्य बीजभूतस्य जगतः सदाख्यस्य ज्योतिः प्रकाशं पश्यन्ति । आशब्द उत्सृष्टानुबन्धः पश्यन्तीत्यनेन संबध्यते । किं तज्ज्योतिः | 'आत् इत्' इसमें आकारके पीछेका तकार और 'इत्' शब्द अर्थरहित हैं। 'प्रत्नस्य'—चिरन्तन यानी पुरातन 'रेतसः' कारणके अर्थात् जगत्के बीजभूत सत्-संज्ञक ब्रह्मके 'ज्योतिः'—प्रकाशको देखते हैं। अपने अनुबन्ध तकारसे रहित 'आ' शब्द 'पश्यन्ति' इस क्रियासे सम्बद्ध है । उस किस ज्योतिको देखते हैं ? इसपर श्रुति |
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* आनन्दगिरिकृत टीकासे ।