भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 978 में से

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पृष्ठ 337

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३


| संबन्धित्वं विधियज्ञस्येव ।<br>किं च तन्मरणमेवास्य पुरुष-<br>यज्ञस्यावभृथः; समाप्तिसामा-<br>न्यात् ॥ ५ ॥ | ही है; तथा मरण ही इस पुरुषसंज्ञक<br>यज्ञका अवभृथस्नान है, क्योंकि<br>समाप्तिमें इन (मरण और अवभृथ-<br>स्नान) दोनोंकी तुल्यता है ॥ ५ ॥ |


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तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो-<br>क्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं<br>प्रतिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति<br>तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ६ ॥

घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित (अक्षय) है, ( २ ) अच्युत (अविनाशी) है और ( ३ ) अतिसूक्ष्म प्राण है।' तथा इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं ॥ ६ ॥

| तद्धैतद्यज्ञदर्शनं घोरो नामत<br>आङ्गिरसो गोत्रतः कृष्णाय<br>देवकीपुत्राय शिष्यायोक्त्वोवाच<br>तदेतत्त्रयमित्यादिव्यवहितेन सं-<br>बन्धः । स चैतद्दर्शनं श्रुत्वापि-<br>पास एवान्याभ्यो विद्याभ्यो<br>बभूव । इत्थं च विशिष्टेयं विद्या<br>यत्कृष्णस्य देवकीपुत्रस्यान्यां | इस यज्ञदर्शनको आङ्गिरस गोत्र-<br>वाले घोरनामक ऋषिने अपने शिष्य<br>देवकीपुत्र कृष्णके प्रति कहकर फिर<br>कहा। इस वाक्यका 'तदेतत्त्रयम्'<br>इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे सम्बन्ध<br>है। तथा वह कृष्ण तो इस यज्ञ-<br>दर्शनका श्रवण कर फिर अन्य<br>विद्याओंके प्रति तृणारहित हो<br>गया। 'यह विद्या ऐसी विशिष्ट<br>गुणसम्पन्ना है कि यह अन्य विद्याओं-<br>के प्रति देवकीपुत्र कृष्णकी तृष्णा- |