छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२९
मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा था; जो इस प्रकार जानता है वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥
| एतद्यज्ञदर्शनं ह स्म वै किल तद्विद्वानाह महिदासो नामतः, इतराया अपत्यमैतरेयः। किं कस्मान्मे ममैतदुपतपनमुपतपसि स त्वं हे रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन त्वत्कृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न मरिष्याम्यतो वृथा तव श्रम इत्यर्थः। इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण संबन्धः। स एवंनिश्चयः सन् षोडशं वर्षशतमजीवत्। अन्योऽप्येवंनिश्चयः षोडशं वर्षशतं प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञसंपादनं वेद जानाति, स इत्यर्थः ॥ ७ ॥ | इस प्रसिद्ध यज्ञदर्शनको जाननेवाले महिदासनामक इतराके पुत्र ऐतरेयने 'हे रोग ! तू मुझे यह संताप क्यों देता है ? जो यज्ञरूप मैं तेरे इस संतापसे मृत्युको प्राप्त नहीं होऊँगा—नहीं मरूँगा; तात्पर्य यह है कि इसलिये तेरा यह श्रम वृथा ही है—इस प्रकार कहा था—इसका पूर्वसे सम्बन्ध है। ऐसे निश्चयवाला होकर वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा। ऐसे ही निश्चयवाला दूसरा पुरुष भी, जो इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको जानता है, एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥