भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 978 में से

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पृष्ठ 334

सप्तदश खण्ड

अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना

स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥

वह [ पुरुष ] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण ( प्रसन्न ) नहीं होता—वही इसकी दीक्षा है ॥ १ ॥

| स यदशिशिषतीत्यादियज्ञ-सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणैव संबध्यते । यदशिशिषत्यशितुमिच्छति, तथा पिपासति पातुमिच्छति, यन्न रमत इष्टाद्यप्राप्तिनिमित्तम्, यदेवंजातीयकं दुःखमनुभवति ता अस्य दीक्षाः, दुःखसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।१। | 'वह जो भोजन करनेकी इच्छा करता है' इत्यादि पुरुषका यज्ञसे सादृश्यनिरूपण पूर्वग्रन्थसे ही सम्बन्ध रखता है । जो 'अशिशिषति'—खानेकी इच्छा करता है, तथा 'पिपासति' पीनेकी इच्छा करता है, तथा जो इष्ट पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण रममाण नहीं होता अर्थात् जो इस प्रकारके दुःखका अनुभव करता है, वह, दुःखमें सदृशता होनेके कारण विधियज्ञकी दीक्षाके समान, इसकी दीक्षा है॥१॥ |

—: ० :—

अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥२॥

फिर वह जो खाता है, जो पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी सदृशताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥