भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्याथ ३२७

इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन त्रिष्टुप् छन्दसे सम्बद्ध है। उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप रुद्रगण! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥

| अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्व-<br><br>र्षाणीत्यादि समानम्। रुदन्ति<br><br>रोदयन्तीति प्राणा रुद्राः क्रूरा<br><br>हि ते मध्यमे वयस्यतो रुद्राः<br><br>॥ ३-४ ॥ | 'अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि'<br>इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है।<br>रोते अथवा रुलाते हैं, इसलिये<br>प्राण 'रुद्र' हैं। वे (प्राण) मध्यम<br>आयुमें क्रूर होते हैं, इसलिये रुद्र<br>कहलाते हैं ॥ ३-४ ॥ |

अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवन- मष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदꣳसर्वमाददते ॥ ५ ॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चि- दुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवन- मायुरनुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं। जगती छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन जगती छन्दसे सम्बद्ध