भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 978 में से

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पृष्ठ 329

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५


| विशिनष्टि । प्राणा वाव वसवो वागादयो वायवश्च; ते हि यस्मादिदं पुरुषादिप्राणिजातमेते वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा; इत्यतो वसनाद्वासनाच्च वसवः ॥१॥ | श्रुति उनकी विशेषता ( विभिन्नता ) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं । देहमें प्राणोंके रहते हुए ही यह सब बसा हुआ है, और किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण प्राण वसु हैं ॥ १ ॥ |

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तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳसवनमनुसंतनु- तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्यु- द्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥

यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे कोई रोग आदि कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २ ॥

| तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रातःसवनसंपन्ने वयसि किञ्चिद्गदाध्यादि मरणशङ्काकारणमुपतपेद्दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी | उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयुमें मरणकी शङ्काकी कारणभूत कोई व्याधि आदि कष्ट पहुँचावे तो वह यज्ञसम्पादन करनेवाला पुरुष |