छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२१
भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्ये ऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तद्वोचम् ॥ ६ ॥ अथ यदवोचँस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥
उस मैंने जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ ॥ ४ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण हूँ' ॥ ५ ॥ फिर मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और आदित्यकी शरण हूँ' ॥ ६ ॥ तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है, यही मैंने कहा है ॥ ७ ॥
| स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति व्याख्यानार्थमुपन्यासः । प्राणो वा इदँसर्वं भूतं यदिदं जगत् । ‘यथा वारा नाभौ’ ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) इति वक्ष्यति । अतस्तमेव सर्वं तत्त्वेन प्राणप्रतिपादनेन प्रापत्तिं प्रपन्नोऽभूवम् । तथा भूः प्रपद्य इति त्रीँल्लोकान् | 'उस मैंने जो कहा कि मैं प्राणकी शरण हूँ' इसीकी व्याख्या करनेके लिये विस्तार किया जाता है। यह जितना भी जगत् है सब प्राण ही है, 'जैसे कि नाभिमें अरे लगे रहते हैं [ उस प्रकार प्राणमें सम्पूर्ण भूत समर्पित हैं]' ऐसा आगे कहेंगे भी। अतः उस प्राणकी प्रतिपत्तिके द्वारा मैं उस सर्वभूत [विराट्] की ही शरण हूँ। मैंने जो यह कहा कि 'मैं भूः- |