भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०९


देवस्य। तस्माद्यथेह सर्वकाम इति बहुव्रीहिस्तथा कामोऽस्मीति स्मृत्यर्थो वाच्यः।परार्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा।<br>अतः जिस प्रकार यहाँ 'सर्वकामः' पदमें बहुव्रीहिसमास किया गया है उसी प्रकार 'कामोऽस्मि' इस स्मृतिका अर्थ करना चाहिये। ✽
सर्वगन्धः, सर्वे गन्धाः सुखकरा अस्य सोऽयं सर्वगन्धः। "पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्" (गीता ७।९) इति स्मृतेः। तथा रसा अपि विज्ञेया अपुण्यगन्धरसग्रहणस्य पाप्मसम्बन्धनिमित्तत्वश्रवणात्। "तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च। पाप्मना ह्येष विद्धः" (छा० उ० १।२।२) इति श्रुतेः। न च पाप्मसंसर्ग ईश्वरस्य, अविद्यादिदोषस्यानुपपत्तेः।सर्वगन्ध—समस्त सुखकर गन्ध उसीके हैं इसलिये वह 'सर्वगन्ध' है; जैसा कि "पृथिवीमें मैं पुण्यगन्ध हूँ" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। इसी प्रकार पुण्यरस भी उसीके समझने चाहिये। क्योंकि श्रुतिने अपुण्यगन्ध और रसका ग्रहण तो पापसम्बन्धके निमित्तसे बतलाया है; जैसा कि "इसीसे उस (घ्राणेन्द्रिय) के द्वारा सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनोंको ही सूँघता है, क्योंकि यह पापसे विद्ध है" इस श्रुतिद्वारा प्रमाणित होता है। किंतु ईश्वरका पापसे संसर्ग नहीं है, क्योंकि उसमें अविद्यादि दोष होने सम्भव नहीं हैं।
सर्वमिदं जगदभ्यात्तोऽभिव्याप्तः। अततेर्व्याप्त्यर्थस्य कर्तरि निष्ठा। तथावाकी, उच्यते-इस सम्पूर्ण जगत्‌को वह सब ओर व्याप्त किये हुए है। व्याप्ति अर्थवाले 'अत्' धातुसे कर्ता अर्थमें निष्ठा (क्त) प्रत्यय होनेसे 'आत्तः' पद सिद्ध होता है। इसी प्रकार वह अवाकी भी है, जिसके द्वारा बोला जाता है उसे 'वाक्'

✽ तात्पर्य यह कि उक्त गीताके 'कामोऽस्मि' इन पदोंका 'काम हूँ' ऐसा अर्थ न करके 'कामवाला हूँ' यह अर्थ समझना चाहिये।