भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 978 में से

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पृष्ठ 314
३१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| ऽन्येति वाक्, वागेव वाकः। यद्वा वचेर्घञन्तस्य करणे वाकः। स यस्य विद्यते स वाकी न वाकी अवाकी। वाक्यप्रतिषेधश्चात्रोपलक्षणार्थः। गन्धरसादिश्रवणादीश्वरस्य प्राप्तानि घ्राणादीनि करणानि गन्धादिग्रहणाय। अतो वाक्प्रतिषेधेन प्रतिषिष्यन्ते तानि। "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः" (श्वे० उ० ३।१९) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। | कहते हैं, 'वाक्' ही 'वाक' है। अथवा 'वच्' धातुसे करण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करनेसे 'वाक' शब्द निष्पन्न होता है। वह (वाक) जिसमें हो उसे 'वाकी' कहते हैं, जो वाकी न हो वही 'अवाकी' कहलाता है। यहाँ जो वाक्का प्रतिषेध किया गया है वह अन्य इन्द्रियोंका भी उपलक्षण करनेके लिये है। श्रुतिमें गन्ध और रसादिका प्रसंग होनेसे उन गन्धादिका ग्रहण करनेके लिये ईश्वरके घ्राणादि इन्द्रियाँ होनी सिद्ध होती हैं; अतः वाक्के प्रतिषेधद्वारा उन सबका भी प्रतिषेध किया गया है; जैसा कि "बिना हाथ-पावका ही वह वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है तथा बिना नेत्रका होकर भी देखता और बिना कर्णका होकर भी सुनता है" इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। | | अनादरोऽसंभ्रमः। अप्राप्तप्राप्तौ हि संभ्रमः स्यादनाप्तकामस्य। न त्वाप्तकामत्वान्नित्यतृप्तस्येश्वरस्य संभ्रमोऽस्ति क्वचित्॥२॥ | अनादर अर्थात् असम्भ्रम (आग्रहरहित) है। जो आप्तकाम नहीं है उसे ही अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिके लिये आग्रह हो सकता है। आप्तकाम होनेके कारण नित्यतृप्त ईश्वरको कहीं भी सम्भ्रम नहीं है॥२॥ |

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