भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 978 में से

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पृष्ठ 315

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३११


ब्रह्म छोटेसे छोटा और बड़ेसे बड़ा है

एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ ३ ॥

हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एष यथोक्तगुणो मे ममात्मान्तर्हृदये हृदयपुण्डरीकस्यान्तर्मध्येऽणीयानणुतरो व्रीहेर्वा यवाद््वेत्याद्यत्यन्तसूक्ष्मत्वप्रदर्शनार्थम् । श्यामाकाद्वा श्यामाकतण्डुलाद्वेति परिच्छिन्नपरिमाणादणीयानित्युक्तेऽणुपरिमाणत्वं प्राप्तमाशङ्क्य अतस्तत्प्रतिषेधायारभते—एष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान्पृथिव्या इत्यादिना । ज्यायःपरिमाणाच्च ज्यायस्त्वं दर्शयन्ननन्तपरिमा-यह उपर्युक्त गुणविशिष्ट मेरा आत्मा अन्तर्हृदय—हृदयकमलके अन्तः—भीतर व्रीहि (धान) से, अथवा यवादिसे भी अणीयान्—सूक्ष्मतर है, यह कथन आत्माकी अत्यन्त सूक्ष्मता प्रदर्शित करनेके लिये है। वह श्यामाक और श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है—इस प्रकार परिच्छिन्न परिमाणसे सूक्ष्म बतलानेपर उसका अणुपरिमाणत्व प्राप्त होता है—ऐसी आशङ्का कर अब उसका प्रतिषेध करनेके लिये 'एष म आत्मा ज्यायान्पृथिव्याः' इत्यादि वाक्यसे श्रुति आरम्भ करती है। इस प्रकार स्थूलतर पदार्थोंकी अपेक्षा भी उसकी महत्ता प्रदर्शित कर श्रुति 'मनोमयः'