छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 205, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १९] शाङ्करभाष्यार्थ २०१
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है; अङ्गवान् होता है । वह अङ्गके कारण कुटिल नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । एक वर्षतक मांसभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा [ सर्वदा ही ] मांसभक्षण न करे—ऐसा नियम है ॥ २ ॥
| अङ्गी भवति समग्राङ्गो भवतीत्यर्थो नाङ्गेन हस्तपादादिना विहूर्च्छति न कुटिली भवति पङ्गुः कुणी वेत्यर्थः । संवत्सरं संवत्सरमात्रं मज्ज्ञो मांसानि नाश्नीयान्न भक्षयेत् । बहुवचनं मत्स्योपलक्षणार्थम् । मज्ज्ञो नाश्नीयात्सर्वदैव नाश्नीयादिति वा तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | अङ्गी होता है अर्थात् पूर्णाङ्ग होता है। अङ्ग अर्थात् हाथ-पाँव आदिके द्वारा कुटिल यानी लँगड़ा या इमश्रुरहित नहीं होता। संवत्सरपर्यन्त अर्थात् केवल एक साल मांसभक्षण न करे। 'मज्ज्ञः' इस पदमें बहुवचन मछलियोंको उपलक्षित करानेके लिये है [ अर्थात् मांस एवं मत्स्यादि न खाय ] । अथवा 'मज्ज्ञो नाश्नीयात्—सर्वदा ही मांस-मछली न खाय—ऐसा नियम है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकोनविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥