भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 978 में से

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पृष्ठ 206

विंश खण्ड

—: ० :—

राजनसामकी उपासना

अग्निहिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ १ ॥

अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है ॥ १॥

अग्निर्हिंकारः प्रथमस्थानत्वात् । वायुः प्रस्ताव आनन्तर्यसामान्यात् । आदित्य उद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । नक्षत्राणि प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । चन्द्रमा निधनं कर्मिणां तन्निधनात् । एतद्राजनं देवतासु प्रोतं देवतानां दीप्तिमत्त्वात् ॥ १ ॥अग्नि हिंकार है, क्योंकि उसका स्थान सर्वप्रथम है । आनन्तर्यमें तुल्यता होनेके कारण वायु प्रस्ताव है । उत्कृष्ट होनेके कारण आदित्य उद्गीथ है । प्रतिहृत होनेके कारण नक्षत्र प्रतिहार हैं तथा चन्द्रमा निधन है, क्योंकि उसीमें कर्मकाण्डियोंका निधन होता है । यह राजनसाम देवताओंमें अनुस्यूत है, क्योंकि देवगण दीप्तिमान् होते हैं ॥ १ ॥
विद्वत्फलम्—इस उपासनाके विद्वान्‌को प्राप्त होनेवाला फल—

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसार्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्व-