छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| क्तम्। अथेदानों गायत्रादिनामग्रहणपूर्वकं विशिष्टफलानि सामोपासनान्तराण्युच्यन्ते । यथाक्रमं गायत्रादीनां कर्मणि प्रयोगस्तथैव— | वर्णन किया गया। अब आगे 'गायत्र' आदि नाम लेकर विशिष्ट फलवती अन्य सामोपासनाओं का उल्लेख किया जाता है। गायत्र आदि उपासनाओंका उनके क्रमके अनुसार कर्ममें प्रयोग किया जाता है; उसीके अनुसार— |
मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥ १ ॥
मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है ॥ १ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| मनो हिंकारो मनसः सर्वकरणवृत्तीनां प्राथम्यात् । तदानन्तर्याद्वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । प्राणो निधनं यथोक्तानां प्राणे निधनात्स्वापकाले । एतद्गायत्रं साम प्राणेषु प्रोतं गायत्र्याः प्राणसंस्तुतत्वात् ॥ १ ॥ | सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंमें मनकी प्रथमता होनेके कारण मन हिंकार है, उसका पश्चाद्वर्ती होनेसे वाक् प्रस्ताव है, उत्कृष्ट होनेके कारण चक्षु उद्गीथ है, प्रतिहृत होनेके कारण श्रोत्र प्रतिहार है तथा प्राण निधन है, क्योंकि सुषुप्तिकालमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण इन्द्रियवर्ग प्राणमें लीन हो जाते हैं। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है, क्योंकि गायत्रीका प्राणरूपसे स्तवन किया गया है ॥१॥ |
स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वह जो इस प्रकार गायत्रसंज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है, पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता है, प्रजा और पशुओं द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। वह महामना (उदारहृदय) होवे—यही उसका व्रत है ॥२॥