छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश खण्ड
यज्ञायज्ञीयसामकी उपासना
लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥
लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है और मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥
| लोम हिंकारो देहावयवानां प्राथम्यात् । त्वक्प्रस्ताव आनन्तर्यात् । मांसमुद्गीथः श्रैष्ठ्यात् । अस्थि प्रतिहारः प्रतिहतत्वात् । मज्जा निधनमानन्त्यात् । एतद्यज्ञायज्ञीयं नाम साम देहावयवेषु प्रोतम् ॥ १ ॥ | देहके अवयवोंमें सर्वप्रथम होनेके कारण लोम हिंकार है। लोमोंके अनन्तर होनेके कारण त्वचा प्रस्ताव है। उत्कृष्ट होनेके कारण मांस उद्गीथ है प्रतिहत होनेके कारण अस्थि प्रतिहार है तथा सबके अन्तमें स्थित होनेके कारण मज्जा निधन है। यह यज्ञायज्ञीयनामक साम देहके अवयवोंमें अनुस्यूत है ॥ १ ॥ |
स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २ ॥