छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 141, कुल 978 में से
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खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्याथ १३७
मन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥
इसपर उसने 'वह ( देवता ) अन्न है' ऐसा कहा; क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत अपने प्रति अन्नका ही हरण करते हुए जीवित रहते हैं । वह यह अन्न देवता प्रतिहारमें अनुगत है । यदि तू उसे बिना जाने ही प्रतिहरण करता तो मेरेद्वारा उस तरह कहे जानेपर तेरा मस्तक गिर जाता ॥ ९ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| पृष्टोऽन्नमिति होवाच ।<br><br>सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेवात्मानं प्रति सर्वतः प्रतिहरमाणानि जीवन्ति । सैषा देवता प्रतिशब्दसामान्यात्प्रतिहारभक्तिमनुगता । समानमन्यत्तथोक्तस्य मयेति । प्रस्तावोद्गीथप्रतिहारभक्तीः प्राणादित्यान्नदृष्ट्योपासीतेति समुदायार्थः ।<br><br>प्राणाद्यापत्तिः कर्मसमृद्धिर्वा फलमिति ॥ ९ ॥ | इस प्रकार पूछे जानेपर उसने 'वह देवता अन्न है' ऐसा उत्तर दिया, क्योंकि ये सम्पूर्ण भूत सब ओरसे अपनी ओर अन्नका प्रतिहरण करते हुए ही जीवित रहते हैं । वह यह देवता ही 'प्रति' शब्दमें सादृश्य होनेके कारण प्रतिहार भक्तिमें अनुगत है । [ 'तां चेदविद्वान्' यहाँसे लेकर ] 'तथोक्तस्य मया' यहाँतक शेष अर्थ पहलेके समान है । समुदायार्थ ( 'प्राण इति होवाच' इत्यादि सब मन्त्रोंका सारांश ) यह है कि प्रस्ताव, उद्गीथ और प्रतिहार भक्तियोंकी क्रमशः प्राण, आदित्य और अन्नदृष्टिसे उपासना करनी चाहिये । प्राणादिरूपताकी प्राप्ति अथवा कर्ममें समृद्धिलाभ करना यह उस उपासनाका फल है ॥ ९ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
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