भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140
१३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| दित्यमुच्चैरूर्ध्वं सन्तं गायन्ति शब्दयन्ति स्तुवन्तीत्यभिप्रायः, उच्च्छब्दसामान्यात्; प्रशब्दसामान्यादिव प्राणः । अतः सैषा देवतेत्यादि पूर्ववत् ॥ ७ ॥ | अर्थात् ऊपर विद्यमान आदित्यका ही गान—शब्द अर्थात् स्तवन करते हैं; प्रस्तावसे 'प्र' शब्दमें समानता होनेके कारण जैसे प्राण-प्रस्ताव-देवता था उसी प्रकार यहाँ [उद्गत आदित्य और उद्गीथकी ] 'उत्' शब्दमें समानता होनेसे यह उद्गीथ देवता है, अतः वह यह देवता आदि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ७ ॥ |


प्रतिहर्ताका प्रश्न

अथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥८॥

फिर प्रतिहर्ता उसके पास आया [और बोला—] 'भगवन् ! आपने जो मुझसे कहा था कि हे प्रतिहर्तः ! जो देवता प्रतिहारमें अनुगत है यदि उसे बिना जाने ही तू प्रतिहरण करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा—सो वह देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥

| एवमेवाथ हैनँ प्रतिहर्तोपससाद कतमा सा देवता प्रतिहारमन्वायत्तेति ? ॥ ८ ॥ | इसी प्रकार फिर उसके पास प्रतिहर्ता आया और बोला कि 'वह प्रतिहारमें अनुगत देवता कौन है ?' ॥ ८ ॥ |

उषस्तिका उत्तर—प्रतिहारानुगत देवता अन्न है

अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहार-