छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 126, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 126
दशम खण्ड
उषस्तिका आख्यान
| उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावप्रतिहारविषयमप्युपासनं वक्तव्यमितीदमारभ्यते। आख्यायिका तु सुखावबोधार्था। | उद्गीथोपासनाके प्रसङ्गसे यहाँ प्रस्ताव एवं प्रतिहारविषयक उपासना भी बतलायी जानी चाहिये, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है, वह सरलतासे समझनेके लिये है— |
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मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥
ओले और पत्थर पड़नेसे कुरुदेशके खेतीके चौपट हो जानेपर वहाँ इभ्य ग्रामके भीतर 'आटिकी' (जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी अल्पवयस्का) पत्नीके साथ चक्रका पुत्र उषस्ति दुर्गतिकी अवस्थामें रहता था ॥ १ ॥
| मटचीहतेषु मटच्योऽशनयस्ताभिर्हतेषु नाशितेषु कुरुषु कुरुसस्येष्वित्यर्थः। ततो दुर्भिक्षे जात आटिक्यानुपजातपयोधरादिस्त्रीव्यञ्जनया सह जाययोषस्तिर्ह नामतश्चक्रस्यापत्यं चाक्रायणः। इभो हस्ती तमर्हतीतीभ्य | [कुरुओंके] मटचीहत होनेपर— मटची ओले और पत्थरको कहते हैं, उनसे कुरुदेशके अर्थात् कुरुदेशकी खेतीके हत-नष्ट हो जाने तथा उसके कारण दुर्भिक्ष हो जानेपर आटिकी यानी जिसके स्तनादि स्त्रीजनोचित चिह्न प्रकट नहीं हुए हैं ऐसी स्त्रीके साथ उषस्तिनामक चाक्रायण—चक्रका पुत्र इभ्य ग्राममें—इभ हाथीको |
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