छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 376, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 376
३७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
| मेव वागप्येति वायुमिवाग्निः । प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो हि यस्मादेवैतान्वागादीन्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥ | जाती है, जिस प्रकार कि अग्नि वायुको । तथा प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है; क्योंकि प्राण ही इन वाक् आदि सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥ |
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तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥
वे ये दो ही संवर्ग हैं--देवताओंमें वायु और इन्द्रियोंमें प्राण ॥४॥
| तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ संवर्जनगुणौ वायुरेव देवेषु संवर्गः प्राणः प्राणेषु वागादिषु मुख्यः ॥ ४ ॥ | वे ये दो ही संवर्ग—संवर्जन गुणवाले हैं—देवताओंमें वायु ही संवर्ग है तथा वाक् आदि प्राणोंमें (इन्द्रियोंमें) मुख्य प्राण ॥ ४ ॥ |
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संवर्गकी स्तुतिके लिये आख्यायिका
| अथैतयोः स्तुत्यर्थमियमाख्यायिकारभ्यते— | अब इन (वायु और प्राण) की स्तुतिके लिये आख्यायिका आरम्भ की जाती है— |
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अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥
एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षसेनके पुत्र अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी; किंतु उन्होंने उसे भिक्षा न दी ॥ ५ ॥