छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७३
| हेत्यैतिह्यार्थः, शौनकं च शुनकस्यापत्यं शौनक कापेयं कपिगोत्रमभिप्रतारिणं च नामतः कक्षसेनस्यापत्यं काक्षसेनिं भोजनायोपविष्टौ परिविष्यमाणौ सूपकारैर्ब्रह्मचारी ब्रह्मविच्छौण्डो बिभिक्षे भिक्षितवान् । ब्रह्मचारिणो ब्रह्मविन्मानितां बुद्ध्वा तं जिज्ञासमानौ तस्मा उ भिक्षां न ददतुर्न दत्तवन्तौ ह किमयं वक्ष्यतीति ॥ ५ ॥ | ‘ह’ यह निपात ऐतिह्य (परम्परागत कथानक) का द्योतक है । शौनक-शुनकका पुत्र शौनक जो कि कापेय—कपिके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, उससे और कक्षसेनका पुत्र काक्षसेनि, जो नामसे अभिप्रतारी था, उससे, जब कि वे दोनों भोजनके लिये बैठे थे और रसोइयोंद्वारा इन्हें भोजन परोसा जा रहा था; अपनेको ब्रह्मवेत्ताओं में शूरवीर समझनेवाले एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी। ब्रह्मचारीके ‘मैं ब्रह्मवेत्ता हूँ’ ऐसे अभिमानको जानकर यह जाननेकी इच्छासे कि ‘देखें यह क्या कहता है ?’ उन्होंने भिक्षा न दी ॥ ५ ॥ |
— : ० : —
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः स जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन्बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥
उसने कहा—भुवनोंके रक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार महात्माओंको ग्रस लिया है । हे कापेय ! हे अभिप्रतारिन् ! मनुष्य अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं देखते; तथा जिसके लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ॥ ६ ॥
| स होवाच ब्रह्मचारी महात्मनश्चतुर इति द्वितीयाबहुवचनम् । | उस ब्रह्मचारीने कहा—‘महात्मनः और ‘चतुरः’ ये पद द्वितीया विभक्तिके बहुवचन हैं । उस एक ही देव |