छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| देव एकोऽग्न्यादीन्वायुर्वागादीन् प्राणः, कः स प्रजापतिर्जगार ग्रसितवान् कः स जगारेति प्रश्नमेके । भुवनस्य भवन्त्यस्मिन् भूतानीति भुवनं भूरादिः सर्वो लोकस्तस्य गोपा गोपायिता रक्षिता गोप्तेत्यर्थः । तं कं प्रजापतिं हे कापेय नाभि- पश्यन्ति न जानन्ति मर्त्या मरणधर्माणोऽविवेकिनो वा हेऽभिप्रतारिन्बहुधाध्यात्ममाधिदैवताधिभूतप्रकारैर्वसन्तम् । यस्मै वा एतदहन्यहन्यन्नमदनायाह्रियते संस्क्रियते च तस्मै प्रजापतय एतदन्नं न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | क—प्रजापतिने अर्थात् वायुने अग्नि आदिको और प्राणने वागादिको ग्रस लिया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि जिसने ग्रसा है वह एक देव कौन है ? इस प्रकार यह प्रश्न है । वह भुवनका—जिसमें भूत ( प्राणी ) आदि होते हैं उस भूर्लोक आदि समस्त लोकोंको भुवन कहते हैं, उसका गोपा—गोपायिता अर्थात् रक्षा करनेवाला है । हे कापेय ! उस क अर्थात् प्रजापतिको अथवा हे अभिप्रतारिन् ! अनेक प्रकारसे यानी अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-भेदसे वास करते हुए उस देवको मर्त्य—मरणधर्मा अथवा अविवेकी पुरुष नहीं देखते । तथा जिसके भक्षणके लिये नित्यप्रति इस अन्नका आहरण-संस्कार किया जाता है उस प्रजापतिको ही यह अन्न नहीं दिया गया ॥ ६ ॥ |
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तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायात्मा देवानां जनिता प्रजानाँ१हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिर्महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदनन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥७॥
उस वाक्यका कपिगोत्रोत्पन्न शौनक ने मनन किया और फिर उस [ ब्रह्मचारी ] के पास आकर कहा—'जो देवताओंका आत्मा, प्रजाओंका