भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 978 में से

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पृष्ठ 385

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३८१

किंगोत्रोऽहं किमस्य मम गोत्रं सोऽहं किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १।मैं किंगोत्र हूँ ? मेरा क्या गोत्र है ? अर्थात् मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १॥

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एवं पृष्टा—इस प्रकार पूछी जानेपर—

सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २॥

उसने उससे कहा—'हे तात ! तू जिस गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । पहले मैं पतिके घर आये हुए बहुत-से अतिथियोंकी सेवा-टहल करनेवाली परिचारिका थी । [परिचर्यामें संलग्न होनेसे गोत्र आदिकी ओर मेरा ध्यान नहीं था ] उन्हीं दिनों युवावस्था में जब मैंने तुझे प्राप्त किया [ तुम्हारे पिता परलोकवासी हो गये, अतः उनसे भी पूछ न सकी ] इसलिये मैं यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मैं तो जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अतः तू अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना' ॥ २ ॥

जबाला सा हैन पुत्रमुवाच— नाहमेतत्तव गोत्रं वेद, हे तात यद्गोत्रस्त्वमसि । कस्मान्न वेत्सि ? इत्युक्ताह-बहु भर्तृगृहे परिचर्याजातमतिथ्यभ्यागतादि चरन्त्यहं परिचारिणी. परिचरन्तीति परिचरणशीलैवाहम्, परिचरणचित्ततया गोत्रादिस्मरणे मम मनोउस जबालाने अपने उस पुत्रसे कहा—'हे तात ! जिस गोत्रवाला तू है मैं इस तेरे गोत्रको नहीं जानती।' क्यों नहीं जानती ?--इस प्रकार कही जानेपर वह बोली—पतिके घरमें अतिथि और अभ्यागतादिकोंकी बहुत टहल करनेवाली मैं परिचारिणी—परिचर्या करनेवाली अर्थात् शुश्रूषापरायण थी । इस प्रकार परिचर्यामें चित्त लगा रहनेके कारण गोत्रादिको याद रखनेमें मेरा