भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 978 में से

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पृष्ठ 384

चतुर्थ खण्ड

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सत्यकामका ब्रह्मचर्य-पालन और वनमें जाकर गो चराना

| सर्वं वागाद्यग्न्यादि चान्नान्नादत्वसंस्तुतं जगदेकीकृत्य षोडशधा प्रविभज्य तस्मिन्ब्रह्मदृष्टिर्विधातव्येत्यारभ्यते। श्रद्धा-तपसोर्ब्रह्मोपासनाङ्गत्वप्रदर्शनायाख्यायिका। | अन्न और अन्नादरूपसे भली प्रकार स्तुत हुए वागादि और अग्न्यादिरूप सम्पूर्ण जगत्को कारणरूपसे एक कर फिर उसके सोलह-विभाग कर उसमें ब्रह्मदृष्टिका विधान करना है; इसीके लिये अब आरम्भ किया जाता है। यहाँ जो आख्यायिका है वह श्रद्धा और तपका ब्रह्मोपासनाका अङ्गत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |

सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥

जबालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जबालाको सम्बोधित करके निवेदन किया—'हे पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक [ गुरुकुलमें ] निवास करना चाहता हूँ; [ बता ] मैं किस गोत्रवाला हूँ ?' ॥ १ ॥

| सत्यकामो ह नामतः, हशब्द ऐतिह्यार्थः, जबालाया अपत्यं जाबालो जबालां स्वां मातरमामन्त्रयाञ्चक्र आमन्त्रितवान् । ब्रह्मचर्यं स्वाध्यायग्रहणाय हे भवति विवत्स्याम्याचार्यकुले | 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है। जबालाके पुत्रने, जो नामसे सत्यकाम था, अपनी माता जबालाको आमन्त्रित—सम्बोधित [ करके निवेदन] किया—'हे पूजनीये ! मैं स्वाध्यायग्रहणके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक आचार्यकुलमें निवास करूँगा। |