छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९
| तथा विद्वान्दशदेवतात्मभूतः संवर्गविद्यायाः सन्विराट्त्वेन दशसर्वोपलब्धि-संख्यान्नं कृतफलत्वम् संख्ययान्नादी च । तथात्रान्नादित्येदं सर्वं जगद्दशदिक्संस्थं दृष्टं कृतसंख्याभूतयोपलब्धम् । एवंविदोऽस्य सर्वं कृतसंख्याभूतस्य दशदिक्संबद्धं दृष्टमुपलब्धं भवति । किञ्चान्नादश्च भवति य एवं वेद यथोक्तदर्शी । द्विरभ्यास उपासनसमाप्त्यर्थः ॥ ८ ॥ | इस प्रकार जाननेवाला उपासक दश देवताओंसे तादात्म्य प्राप्त कर दश संख्याके कारण विराट्रूपसे अन्न और कृतरूपसे अन्नादी हो जाता है । इस प्रकार कृतसंख्याभूत उस अन्न और अन्नादिनीद्वारा दशों दिशाओंसे सम्बद्ध यह सारा जगत् दृष्ट अर्थात् उपलब्ध कर लिया गया है । इस प्रकार जाननेवाले कृतसंख्याभूत इस विद्वान्को दशों दिशाओंसे सम्बद्ध सब कुछ दृष्ट यानी उपलब्ध हो जाता है । तथा पूर्वोक्तदृष्टिवाला जो उपासक इस प्रकार जानता है वह अन्नाद [दीप्ताग्नि] भी होता है । 'य एवं वेद य एवं वेद' यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥ ८ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
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