छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 601, कुल 978 में से
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्माभिः कदाचित्क्वचिदपि स-<br>तोऽन्यदभिधानमभिधेयं वा वस्तु<br>परिकल्प्यते । सदैव तु सर्व-<br>मभिधानमभिधीयते च यदन्य-<br>बुद्ध्या । यथा रज्जुरेव सर्प-<br>बुद्ध्या सर्प इत्यभिधीयते यथा<br>वा पिण्डघटादि मृदोऽन्यबुद्ध्या<br>पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते<br>लोके । रज्जुविवेकदर्शिनां तु<br>सर्पाभिधानबुद्धी निवर्तेते यथा च<br>मृद्विवेकदर्शिनां घटादिशब्द-<br>बुद्धी तद्वत्सद्विवेकदर्शिनामन्य-<br>विकारशब्दबुद्धी निवर्तेते ।<br>“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य<br>मनसा सह” (तै० उ. २।४)<br>इति । “अनिरुक्तेऽनिलयने”<br>(तै० उ० २ । ६ । १) इत्यादि<br>श्रुतिभ्यः । | उसी प्रकार हमारेद्वारा कभी कहीं<br>भी सत्से भिन्न किसी नाम अथवा<br>नामकी विषयभूत वस्तुकी कल्पना<br>नहीं की जाती । सारे नाम और<br>जो अन्यबुद्धिसे कहे जाते हैं वे<br>सारे पदार्थ सत् ही हैं, जिस प्रकार<br>कि लोकमें रज्जु ही सर्पबुद्धिसे<br>‘सर्प’ इस प्रकार कही जाती है<br>अथवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य-<br>बुद्धिके कारण पिण्ड और घटादिको<br>पिण्ड एवं घट आदि शब्दोंसे पुकारा<br>जाता है । जिस प्रकार रज्जुका<br>विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें<br>‘सर्प’ शब्द और सर्पबुद्धि निवृत्त हो<br>जाते हैं तथा मृत्तिकाका विवेक<br>करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें घटादि-<br>शब्द और तत्सम्बन्धिनी बुद्धिका<br>निरास हो जाता है, उसी प्रकार<br>सत्का विवेक करके देखनेवालोंके<br>लिये अन्य विकारसम्बन्धी शब्द<br>और बुद्धि निवृत्त हो जाते हैं, जैसा<br>कि “जहाँसे मनके सहित वाणी<br>न पहुँचकर लौट आती है” “जो<br>वाणीका अविषय और अनाश्रय है<br>उसमें” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित<br>होता है । |