भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 978 में से

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पृष्ठ 609

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०५


कानि तानि ? इत्युच्यन्ते, आण्डजमण्डाज्जातमण्डजम् , अण्डजमेवाण्डजं पक्ष्यादि । पक्षिसर्पादिभ्यो हि पक्षिसर्पादयो जायमाना दृश्यन्ते । तेन पक्षी पक्षिणां बीजं सर्पः सर्पाणां तथान्यदप्यण्डाज्जातं तज्जातीयानां बीजमित्यर्थः ।वे कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—आण्डज—अण्डसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं, अण्डज ही आण्डज हैं, अर्थात् पक्षी आदि; क्योंकि पक्षी एवं सर्पादिसे पक्षी और सर्पादि उत्पन्न होते देखे गये हैं; अतः पक्षियोंके बीज पक्षी हैं और सर्पोंके सर्प । इसी प्रकार अण्डेसे उत्पन्न हुए अन्य जीव भी अपनी-अपनी जातिके बीज हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
नन्वण्डाज्जातमण्डजमुच्यतेऽतोऽण्डमेव बीजमिति युक्तं कथमण्डजं बीजमुच्यते ।शङ्का—किंतु अण्डेसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं; इसलिये अण्डा ही बीज है—ऐसा कहना उचित है; फिर अण्डजको बीज क्यों कहा जाता है ?
सत्यमेवं स्यात्, यदि त्वदिच्छास्तन्त्रा श्रुतिः स्यात्; स्वतन्त्रा तु श्रुतिः, यत आहाण्डजाद्येव बीजं नाण्डादीति । दृश्यते चाण्डजाद्यभावे तज्जातीयसन्तत्यभावो नाण्डाद्यभावे । अतोऽण्डजादीन्येव बीजान्यण्डजादीनाम् ।समाधान—यदि श्रुति तुम्हारी इच्छाके अधीन होती तो सचमुच ऐसा ही होता; किंतु श्रुति स्वतन्त्र है, क्योंकि उसने अण्डज आदिको बीज बतलाया है, अण्डे आदिको नहीं बतलाया। यही बात देखी भी जाती है कि अण्डज आदिका अभाव होनेपर ही उस जातिकी संततिका अभाव होता है, अण्डे आदिका अभाव होनेपर नहीं । अतः अण्डजादिके बीज अण्डजादि ही हैं ।