छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 605, कुल 978 में से
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खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१
| ननु सतोऽप्युपचरितमेवेक्षितृत्वम् । | शङ्का—किंतु सत्का ईक्षण भी तो उपचारसे ही है ? |
|---|---|
| न; सदीक्षणस्य केवलशब्दगम्यत्वान्न शक्यमुपचरितं कल्पयितुम् । तेजःप्रभृतीनां त्वनुमीयते मुख्येक्षणाभाव इति युक्तमुपचरितं कल्पयितुम् । | समाधान—नहीं, सत्का ईक्षण केवल शब्दगम्य है; इसलिये वह उपचारसे है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। तेज आदिके मुख्य ईक्षणका अभाव तो अनुमानसे सिद्ध है; इसलिये उसे उपचरित मानना ठीक है। |
| ननु सतोऽपि मृद्वत्कारणत्वादचेतनत्वं शक्यमनुमातुम् । अतः प्रधानस्यैवाचेतनस्य सचेतनार्थत्वान्नियतकालक्रमविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्चैक्षतेवैक्षतेति शक्यमनुमातुमुपचरितमेवेक्षणम् । दृष्टश्च लोकेऽचेतने चेतनवदुपचारः । यथा कूलं पिपतिषतीति तद्वत्सतोऽपि स्यात् । | शङ्का—परंतु मृत्तिकाके समान कारण होनेसे सत्के अचेतनत्वका भी अनुमान किया जा सकता है। अतः अचेतन प्रधानरूप जो सत् है वह चेतनके प्रयोजनके लिये है और नियतकालक्रमसे विशिष्ट कार्यका उत्पादक है, इस कारण उसीने ईक्षण करनेके समान ईक्षण किया—इस प्रकार उसका ईक्षण उपचरित ही है, ऐसा अनुमान किया ही जा सकता है। लोकमें अचेतनमें चेतनके समान उपचार होता देखा ही जाता है, जिस प्रकार 'किनारा गिरना चाहता है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार सत्का ईक्षण भी औपचारिक हो सकता है। |
| न; तत्सत्यं स आत्मेति तस्मिन्नात्मोपदेशात् । | समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि, 'वह सत्य है' वह आत्मा है, ऐसा कहकर उसीमें आत्माका उपदेश किया गया है । |