भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 612
६०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| देहमनुप्रविश्य दुःखमनुभविष्यामीति संकल्पनमनुप्रवेशश्च स्वातन्त्र्ये सति । | आश्रयभूत शरीरमें अनुप्रवेश करके दुःखका अनुभव करूँ, और फिर उसमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है । | | सत्यमेवं न युक्तं स्याद्यदि स्वेनैवाविकृतेन रूपेणानुप्रविशेयं दुःखमनुभवेयमिति च संकल्पितवती, न त्वेनम्; कथं तर्हि ? अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्येति वचनात् । | समाधान - ठीक है, यदि वह ऐसा संकल्प करता कि अपने अविकृतरूपसे ही अनुप्रवेश करूँ और दुःखका अनुभव करूँ तब तो ऐसा करना ठीक नहीं था, किंतु ऐसी बात है नहीं । तो फिर क्या है ?— 'इस जीवात्मारूपसे अनुप्रवेश करूँ' ऐसा वचन होनेके कारण [ उसका साक्षात् प्रवेश सिद्ध नहीं होता ] । | | जीवो हि नाम देवताया आभासमात्रम् । बुद्ध्यादिभूतमात्रासंसर्गजनित आदर्श इव प्रविष्टः पुरुषप्रतिबिम्बो जलादिष्विव च सूर्यादीनाम् । अचिन्त्यानन्तशक्तिमत्या देवताया बुद्ध्यादिसंबन्धश्चैतन्याभासो देवतास्वरूपविवेकाग्रहणनिमित्तः सुखी दुःखी मूढ इत्याद्यनेकविकल्पप्रत्ययहेतुः । | जीव तो उस देवताका आभासमात्र है, जो दर्पणमें प्रविष्ट हुए पुरुषके प्रतिबिम्बके समान तथा जल आदिमें प्रविष्ट हुए सूर्यके आभासके समान बुद्धि आदि भूतमात्राओंके संसर्गसे उत्पन्न हुआ है । अचिन्त्य एवं अनन्त शक्तिसे युक्त उस देवताका बुद्धि आदिसे सम्बन्ध रूप जो चैतन्याभास है वही उस देवताके स्वरूपका विवेक ग्रहण न करनेके कारण सुखी, दुःखी, मूढ इत्यादि अनेकों विकल्पोंकी प्रतीतिका कारण होता है । |