छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 613, कुल 978 में से
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| छायामात्रेण जीवरूपेणानुप्रविष्टत्वाद्देवता न दैहिकैः स्वतः सुखदुःखादिभिः संबध्यते । यथा पुरुषादित्यादय आदर्शोदकादिषुच्छायामात्रेणानुप्रविष्टा आदर्शोदकादिदोषैर्न संबध्यन्ते तद्वद्देवतापि । "सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।१२) । "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः" इति हि काठके । "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृह० उ० ४।३।७) इति च वाजसनेयके । | छायामात्र जीवरूपसे अनुप्रविष्ट होनेके कारण वह देवता स्वयं देहके सुख-दुःखादिसे सम्बद्ध नहीं होता । जिस प्रकार दर्पण और जल आदिमें छायामात्रसे अनुप्रविष्ट हुए मनुष्य और सूर्य आदि दर्पण और जल आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते उसी प्रकार वह देवता भी निर्लिप्त रहता है । "जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका चक्षुरूप सूर्य चक्षुसम्बन्धी बाह्य दोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका एक ही अन्तरात्मा लौकिक दुःखोंसे लिप्त नहीं होता बल्कि उनसे बाहर रहता है" "तथा वह आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त एवं नित्य है", इस प्रकार कठोपनिषद्में तथा "मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है", इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद्में भी कहा है । |
| ननुच्छायामात्रश्चेज्जीवो मृषैव प्राप्तस्तथा परलोकेहलोकादि च तस्य । | **शङ्का—**यदि जीव छायामात्र ही है तो वह मिथ्या ही सिद्ध होता है तथा उसके परलोक, इहलोक आदि भी मिथ्या ही ठहरते हैं ? |
| नैष दोषः; सदात्मना सत्यत्वाभ्युपगमात् । सर्वं च नाम- | **समाधान—**ऐसा दोष नहीं है, क्योंकि सत्स्वरूपसे उसका सत्यत्व स्वीकार किया गया है । सारा |