BharatKosha
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 679 of 978

Read in context
Page 679

खण्ड ११] शाङ्करभाष्यार्थ ६७५


| एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच। जीवापेतं जीववियुक्तं वाव किलेदं शरीरं म्रियते न जीवो म्रियत इति। कार्यशेषे च सुप्तोत्थितस्य ममेदं कार्यशेषमपरिसमाप्तमिति स्मृत्वा समापनदर्शनात्। जातमात्राणां च जन्तूनां स्तन्याभिलाषभयादिदर्शनाच्चातीतजन्मान्तरानुभूतस्तनपानदुःखानुभवस्मृतिर्गम्यते अग्निहोत्रादीनां च वैदिकानां कर्मणामर्थवत्त्वान्न जीवो म्रियत इति। स य एषोऽणिमेत्यादि समानम्। <br><br> कथं पुनरिदमत्यन्तस्थूलं पृथिव्यादि नामरूपवज्जगदत्यन्तसूक्ष्मात्सद्रूपान्नामरूपरहितात् सतो जायत इत्येतद्दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवापेत—जीवसे वियुक्त हुआ यह शरीर ही मरता है जीव नहीं मरता' ऐसा [आरुणिने] कहा, क्योंकि कार्य शेष रहनेपर ही सोकर उठे हुए पुरुषको 'मेरा यह काम शेष रह गया था' ऐसा स्मरण करके उसे समाप्त करते देखा जाता है। तथा तत्काल उत्पन्न हुए जीवोंको स्तनपानकी अभिलाषा और भय आदि होते देखे जानेसे पूर्वजन्मोंमें अनुभव किये हुए स्तनपान तथा दुःखानुभवकी स्मृतिका ज्ञान होता है। इसके सिवा अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मोंकी सार्थकता होनेके कारण भी जीव नहीं मरता।' 'स य एषोऽणिमा' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। <br><br> 'किंतु यह अत्यन्त स्थूल 'पृथिवी' आदि नाम और रूपोंवाला संसार अत्यन्त सूक्ष्म, सद्रूप, नामरूपरहित सत्‌से किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इस बातको हे भगवन् ! मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये'—ऐसा श्वेतकेतुने कहा । तब पिताने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥


छा० उ० २२—