भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 680, कुल 978 में से

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पृष्ठ 680

द्वादश खण्ड

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न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

यद्येतत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि—यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता है तो—

न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥

इस (सामनेवाले वटवृक्ष) से एक बड़का फल ले आ। [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया।' [ आरुणि— ] 'इसे फोड़' [ श्वेत०— ] 'भगवन् ! फोड़ दिया।' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये अणुके समान दाने हैं।' [आरुणि—] 'अच्छा वत्स ! इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०—] 'फोड़ दिया भगवन् !' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०— ] 'कुछ नहीं भगवन् !' ॥ १ ॥

अतोऽस्मान्महतो न्यग्रोधात् फलमेकमाहरेत्युक्तस्तथा चकार स इदं भगव उपहृतं फलमिति दर्शितवन्तं प्रत्याह फलं भिन्द्धीति भिन्नमित्याहेतरः । तमाह पिता किमत्र पश्यसीत्युक्त आ-इस महान् वटवृक्षसे एक फल ले आ। ऐसा कहे जानेपर उसने वैसा ही किया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मैं यह फल ले आया' इस प्रकार फल दिखलानेवाले उससे [ आरुणिने ] कहा—'इस फलको फोड़ !' इसपर श्वेतकेतु बोला—'फोड़ दिया।' उससे पिताने कहा—'इसमें तू क्या देखता है ?' इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला—