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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

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१७८ चरकसंहिता [ अ० १४

बांधना चाहिये। रात्रि में प्रलेप लगाकर बांधे हुए बन्धन को दिन में खोल देना चाहिये। दिन में बांधे बंधन को रात में खोल देना चाहिये। जिससे कि जलन उत्पन्न न हो। शीत (हेमन्त और शिशिर) काल में बंधी रहने में कोई डर नहीं दिन में बंधी पट्टी रात भी रह जाय, तो कोई डर नहीं ॥ ३५-३८ ॥ संकरः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम् । जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षूः कुटी भूः कुम्भिकैव च ॥ ३६ ॥ कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश । तान् यथावत्प्रवक्ष्यामि सर्वानेवानुपूर्वशः ॥ ४० ॥ इति । स्वेदकर्म के तेरह प्रकार हैं १. संकर, २. प्रस्तर, ३. नाड़ी, ४. परिषेक, ५. अवगाहन, ६. जेन्ताक, ७. अश्मघन, ८. कर्षू, ९. कुटी, १०. भू ११. कुम्भिक, १२. कूप, १३. होलाक, ये तेरह प्रकार के स्वेद हैं। इन तेरह स्वेदों को क्रमशः कहते हैं ॥३६-४०॥ तत्र वस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनं संकरस्वेद इति विद्यात् ॥ ४१ ॥ (१) संकरस्वेद - तिल, माष आदि पदार्थों का पिण्ड बनाकर वस्त्र में लपेट कर अथवा बिना वस्त्र में लपेटे ही गरम करके स्वेदन कार्य करने का नाम 'संकर-स्वेद' है ॥४१॥ शूक-शमी-धान्य-पुलाकानां बेसवारपायस-कृशरोत्कारिकादीनां वा प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तर-प्रच्छदे पद्माङ्गुलोरुबकार्कपत्र-प्रच्छदे वा स्वभ्यक्त-सर्व-गात्रस्य शयानस्योपरि स्वेदनं प्रस्तरस्वेद इति विद्यात् ॥ ४२ ॥ (२) प्रस्तर स्वेद - शूक धान्य (चावल गेहूँ आदि), शमी धान्य (मूंग, उड़द, चना आदि), पुलाक (चावल रहित धान्य, पटास), बेसवार, पायस (मावा, खोया), कृशरा, तिल, उड़द की बनी यवागू, उत्कारिका (उड़द की बनी पूरी या पूवा), आदि वस्तुओं को गरम करके, पत्थर (अथवा काष्ठ आदि कड़ी वस्तु पर फैलाये हुए) रेशम, कम्बल (ऊनी वस्त्र) को फैलाकर, अथवा ऐरण्ड, उरूबक (छोटा एरण्ड), या आक के पत्तों को फैलाकर इन पर औषध लगा देवे। फिर सारे शरीर पर स्नेह लगा कर इन पत्तों या वस्त्र पर लेट कर स्वेद लेने का नाम 'प्रस्तरस्वेद' है ॥४२॥ स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूल-फल-पत्र-शुङ्गादीनां मृग-शकुनि-पिशित-शिर- स्पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथार्हमम्ल-लवण-स्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षी- रादीनां वा कुम्भ्यां बाष्पमनुद्गमन्त्यामुत्कथितानां नाड्या शरेषीका-वंश-