चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वेदनार्थं घृत-क्षीर-तैल-कोष्ठांश्च कारयेत् ॥ ३४ ॥ नाड़ीस्वेद के लिए—ग्राम्य ( पालतू ) पशु और जलीय जन्तुओं का मांस, दूध, बकरी का शिर, सुअर का मध्यभाग, पित्त, रक्त, एरण्ड के बीज, तिल ( तुष रहित ) इन सबकों यथायोग्य उबालकर नलिका द्वारा स्वेद देवे। देश, काल के विभाग को समझने वाला और युक्ति-प्रयोगविधि जानने वाला वैद्य स्वेद देवे। यह स्वेद वात रोग में हितकारी है। वरना, गिलोय, ऐरण्ड, सहजन, मूली के बीज, बांसा, रेणु, करञ्ज, आक, पाषाणभेद और चागेरी के पत्ते लाल सहजन, शिलाह्रा, अत्तक ( तुलसी भेद ) इनके पत्तों को और छालों को भी क्वाथ करके देश, काल के विभाग को जानने वाला, युक्ति को समझने वाला वैद्य नाड़ीस्वेद देवे, यह स्वेद कफ जन्य रोगों में हितकारी है। भूतीक ( बड़ी अजवायन ), पञ्चमूल (बृहत्पञ्चमूल वात कफ हर होने से), सैरेय (झिंटी), दही का पानी ( मस्तु ), आठों प्रकार के मूत्र, अम्लवर्ग से, स्नेह, घृत, तैल आदि के साथ क्वाथ करके वात-कफ मे नाड़ीस्वेद देना चाहिये। ये ग्राम्य मांस आदि तीनो निर्यूह ( क्वाथ ) क्रम से, वातजन्य, कफजन्य, और वात- कफजन्य रोगों में 'जल कोष्ठक' अर्थात् इनके क्वाथों से भरे द्रोणीपात्र में खड़ा करके आदमी को स्वेद देवे। स्वेदन के लिये घी का कोठा ( कोष्ठ ), दूध का कोठा, या तैल का कोठा भी बना लेना चाहिये ॥२६-३४॥ गोधूम-शकलैश्चूर्णैर्यवानाम्म्लसंयुतः । सस्नेह-किण्व-लवणरुपनाहः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥ गन्धैः सुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया । उमया कुष्ठतैलाभ्यां युक्त्या चोपनाहयेत् ॥ ३६ ॥ चर्मभिश्च पनद्धव्यः सलोमभिरपूतिभिः । उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः ॥ ३७ ॥ रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् । विदाह-परिहारार्थं, स्यात्प्रकर्षस्तु शीतले ॥ ३८ ॥ उपनाह विधि-गेहूं का दरकच चूर्ण, जौ का चूर्ण, कांजी, तैल, मद्यकिट्ट के साथ मिलाकर गरम करके उपनाह ( पुलटिस ) बांधना वातजन्य रोगों में उपकारी है। चन्दन अगरू आदि सुगन्धित पदार्थ मद्य पात्र में बैठे तलछट- प्रक्षेप, जीवन्ती सौंफ, कफजन्य रोगों में इनकी पुलटिस लगावे। अलसी, कूठ और तैल से पुलटिस तैयार करे, इसे वात-कफ रोगियों में प्रयोग करे दुर्गन्ध रहित, बालोंवाली एवं उष्ण वीर्य वाली खालों से लेप को बांध देना चाहिये। और जब ऐसे चमड़े न मिले तो रेशमी वस्त्रों से या ऊन से बने कम्बल से