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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

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४२२ चरकसंहिता [ अ० २ तीक्ष्णमपि चान्नमजातं निष्पाव-माष-कुलत्थ-क्षार-सूपोपहितं दधि- मण्डोदश्वित्कट्वराम्ल-काञ्जिकोपसेकं वाराह-माहिषाविक-मात्स्य-गाव- पिशित-पिण्याक-पिण्डालु-शुष्क-शाकोपहितं मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज- शिग्रु-मधुशिग्रु-खडयूष-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेर-गण्डीर-कालमानक- पर्णास-क्षवक-फणिज्जकोपदंशं सुरासौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मधूल- क-शुक्त-कुवल-बदराम्ल-प्रायानुपानं पिष्टान्ननोत्तरभूयिष्ठमुष्माभितप्तो वाऽतिमात्रमतिवेलं पयः पिबति पयसा वा समश्नाति रौहिणीकं काण- कपोतं वा सर्षपतैलक्षारसिद्धं कुलत्थ-पिण्याक-जाम्बव-लकुच-पक्कैः शौक्तिकैर्वा सह क्षीरमाममतिमात्रमथवा पिबत्युष्माभितप्तस्तस्यैवमा- चरतः पित्तं प्रकोपमापद्यते, लोहितं च स्वप्रमाणमतिवर्तते, तस्मिन् प्रमाणातिप्रवृत्ते पित्तं प्रकुपितं शरीरमनुसर्पद्यदैव यकृत्प्लीहप्रभवाणां लोहितवहानां स्रोतसां लोहिताभिष्यन्दगुरूणि मुखान्यासाद्य प्रति- रुन्ध्यात् तदैव लोहितं दूषयति ॥ ३ ॥ जिस प्रकार से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं, उसकी व्याख्या करते हैं । जब मनुष्य यवक (ब्रीहि-विशेष), उद्दालक (वनकोद्रव) कोरदूष, इनमें मिले खान-पान के अति सेवन से, अथवा दूसरे कोई अति उष्ण या तीक्ष्ण गुण वाले अन्न के सेवन करने से, अथवा पूए, उड़द, कुलथी, दालें, क्षारयुक्त पदार्थों के सेवन से, दही, दधिमण्ड (मस्तु), उदश्वित् (आधा जल मिश्रित तक्र), कट्वर (बिना पानी का तक्र या खट्टी छाछ), अम्लकांजी (खट्टी कांजी), सूअर, भैंस, भेड़, मछली और गाय के मांस के सेवन से, पिण्याक (फेणी) पिण्डालु, कचालु शुष्क शाक (सूखे शाक) से युक्त अन्न पान के सेवन से, मूली, सरसों, लशुन, करञ्ज, सहजन, मधुशिग्रु (मीठा सहजन), खडयूष (कढी आदि), भूस्तृण (रोहिष तृण), सुमुख, सुरस, कुठेर, गण्डीर, कालमानक, पर्णास, क्षवक और फणिज्जक (सब तुलसी के भेद) इनके सेवन से, सुरा, सौवीर (कांजी), तुषोदक, मैरेय, मेदक, मधूलक (महुवे की शराब), शुक्त (सिरका आदि), कुवल (बड़ा बेर), बेर अथवा दूसरे खट्टे पदार्थ मिश्रित वस्तुओं के अत्यन्त उपयोग करने से, अधिक उष्णिमा में रहने के पीछे अथवा पिष्टी युक्त अन्न के खाने के उपरान्त बार बार पानी के पीने से, अथवा दूध के साथ रोहतक शाक या कबूतर का मांस, सरसों के तेल अथवा क्षार में सिद्ध किये हुए पदार्थों के खाने से, अथवा कुलथी, उड़द, पिण्याक, जामुन, बड़हल आदि पके हुए फलों के साथ कांजी या कच्चा दूध