BharatKosha
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 441 of 639

Read in context
Page 441

अ० २] निदानस्थानम् ४२३ अतिमात्रा में अथवा शरीर की गरम स्थिति में खाने से, मनुष्य का पित्त प्रकु- पित होजाता है और रक्त अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाता है । पित्त प्रकोप से रक्त का दोष—इस प्रकार प्रमाण में अधिक बढ़ा हुआ रक्त तथा प्रकुपित हुआ पित्त सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है और यकृत् एवं प्लीहा से उत्पन्न होने वाले रक्तवह स्रोतों के बढ़े हुए रक्तके कारण भरे हुए मुखों को पहुँचकर बन्द कर देता है। इस प्रकार संसर्ग द्वारा पित्त रक्त को दूषित कर देता है*॥ ३ ॥ तल्लोहितसंसर्गाल्लोहितप्रदूषणाल्लोहितगन्धवर्णानुविधानाच्च पित्तं लोहितपित्तमित्याचक्षते ॥ ४ ॥ पित्त का रक्त के साथ संसर्ग होने से एवं शरीरस्थरक्त के पित्त के द्वारा दूषित होने से तथा पित्त का रक्त के समान गन्ध एवं रंग होने से पित्त को 'रक्तपित्त' कहते हैं ॥ ४ ॥ तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—अनन्नाभिलाषो भुक्तस्य विदाहः शुक्ताम्लगन्धरस उद्गारश्छर्देरभीक्ष्णागमनं छर्दितस्य बीभ- त्सता स्वरभेदो गात्राणां सदनं परिदाहो मुखाद्धूमागम इव लोहलोहि- तमत्स्यामगन्धित्वमपि चाऽऽस्यस्य रक्त-हरित-हारिद्रवत्वमङ्गावयवशकृ- न्मूत्र-स्वेद-लाला-सिङ्घाणकास्य-कर्णमल-पिडकोल्लिका-पिडकानामङ्ग- वेदन-लोहित-नील-पीत-श्यावानामर्चिष्मतां च रूपाणां स्वप्ने दर्शनम- भीक्ष्णमिति लोहित-पित्त-पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥ रक्तपित्त के पूर्व रूप ये हैं—भोजन में अनिच्छा, खाये हुए अन्न का न पचना, खट्टे या शुक्त गन्ध अथवा रस की डकार आना, बार २ वमन की अभिरुचि, वमन में आये रक्त आदि पदार्थ की भयंकरता, स्वरभेद, अंगों का टूटना, शरीर में दाह, मुख से धुंए के समान श्वास आना, मुख से लोहा, रक्त, या मछली या कच्चे मांस की गन्ध आना, शरीर के अवयव, मल, मूत्र, पसीना, लार, नासिका का मल, मुख का मल, कान का मल, और नेत्र का मल तथा पिडकाओं का, लाल, हरा अथवा हल्दी के समान होना, अंगों में

  • रक्त के बढ़ने से रक्तवह स्रोतो के मुख खुल जाते हैं। परन्तु पित्त के कारण रक्त के दूषित होने से रक्त में घनता बढ़ जाती है। इससे उनका मुख बन्द हो जाता है। पित्त रक्त को दूषित करता है। रक्तवहस्रोतों का प्रभाव स्थान यकृत् और प्लीहा हैं।
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान) · Page 441 of 639 · BharatKosha