चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४९० चरकसंहिता [अ० १ ग्रहण करने का नाम 'परिग्रह' है। सब भोज्य पदार्थों के समुदाय रूप में एक साथ मिलाकर उस में से ग्रहण करना 'सर्वग्रह' है और सब में से प्रत्येक से पृथक् पृथक् ग्रहण करना 'परिग्रह' है। (आहार मात्रा—अग्नि और आहार- द्रव्य की अपेक्षा करती है। इसलिये अग्नि बल की अपेक्षा से सर्वग्रह' और द्रव्य की अपेक्षा से परिग्रह समझना चाहिये ) ॥ २४ ॥ देशः पुनः स्थानं द्रव्याणामुत्पत्तिप्रचारौ देशसात्म्यं चाऽऽचष्टे ॥ २५॥ (५) देश का अर्थ है स्थान । यह स्थान (स्थावर और जंगम) द्रव्यों की उत्पत्ति, प्रचार के साथ साथ देश-सात्म्य को भी बताता है । उत्पत्ति से जैसे—हिमालय में उत्पन्न अन्नादि गुरु और मरु में लघु होता है। प्रचार से जैसे—लघु पदार्थ खाने वाले, मरु भूमि में विचरने वाले, बहुत फिरने वाले प्राणियों का मांस लघु होता है, अन्यों का गुरु । देशसात्म्य जैसे अनूप देश में उष्ण, रूक्ष और मरुभूमि में शीत स्निग्ध पदार्थ हितकारी हैं ॥ २५ ॥ कालो हि नित्यगश्चाऽऽवस्थिकश्च । तत्राऽऽवस्थिको विकारमपेक्षते, नित्यगस्तु खल्वृतुसात्म्यापेक्षः ॥ २६ ॥ (६) काल दो प्रकार का है। नित्यग और आवस्थिक । रोगी की अवस्थानुरूप इन में आवस्थिक-काल विकार को अपेक्षा करता है। नित्यग काल ऋतु, सात्म्य, शीत, उष्ण, वर्षा आदि की अपेक्षा करता है ॥ २६ ॥ उपयोगसंस्था तु उपयोगनियमः, स जीर्णलक्षणापेक्षः ॥ २७ ॥ (७) उपयोग संस्था—उपयोग-व्यवस्था या उपयोग-नियम को उपयोग- संस्था कहते हैं। यह भोजन के पचने की अपेक्षा करता है । 'जीर्णेऽश्नीयात्' यह आगे कहेंगे ॥ २७ ॥ उपयोक्ता पुनः यस्तमाहारमुपयुङ्क्ते यदायत्तमोकसात्म्यम् ॥ २८ ॥ (८) उपयोक्ता—जो उस आहार का उपयोग करता है, उस भोक्ता को 'उपयोक्ता' कहते हैं । जिस के अधीन अभ्यास-सात्म्य है ॥ २८ ॥ इत्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । एषां विशेषाः शुभाशुभफलप्रदाः परस्परोपकारका भवन्ति, तान् बुभुत्सेत । बुद्ध्वा च हितेप्सुरेव स्यात्, न च मोहात्प्रमादाद्वा प्रियमहितमसुखोदर्कमु- पसेव्यं किञ्चिदाहारजातमन्यद्वा ॥ २९ ॥ १ सर्वग्रह-एक मनुष्य का भोजन आठ छटांक होना चाहिये। परिग्रह- चावल, दो छटांक, आटा-५ छटांक, दाल एक छटांक, शाक-एक प्रकार से आठ छटांक ।