चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] विमानस्थानम् ४८१ गुणान्तराधानमुच्यते । ते गुणाश्च तोयाग्निसंनिकर्षशौचमन्थनदेश- काल-वशेन भावनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिश्चाऽऽधीयन्ते ॥२२॥ ( २ ) करण—स्वाभाविक द्रव्यों के संस्कार का नाम 'करण' है । स्वा- भाविक गुण से भिन्न दूसरे गुण को उत्पन्न कर देने का नाम 'संस्कार' है । ये गुण जल, अग्नि के संयोग से, शौच ( धोने आदि से ), मन्थन ( बिलोने से ), देश, काल और स्वरस आदि की भावना से, समय की अधिकता से, ( पात्र आदि की भिन्नता से ), उत्पन्न कर दिये जाते हैं १। बिलोने पर दही के गुण भिन्न हो जाते हैं । दूध को मिट्टी के बर्त्तन और लोहे के बर्त्तन में पकाने पर उसके स्वाद में अन्तर आ जाता है ॥ २२ ॥ संयोगस्तु द्वयोर्बहूनां द्रव्याणां संहतीभावः, स विशेषमारभते यन्नैकैकशो द्रव्याण्यारभन्ते । तद्यथा मधुसर्पिषोः, मधुमत्स्यपयसां च संयोगः ॥ २३ ॥ ( ३ ) संयोग—दो या दो से अधिक पदार्थों का मिलना 'संयोग' कहाता है । संयोग विशेष कार्य उत्पन्न करता है जब कि अकेला २ द्रव्य वह कार्य उत्पन्न नहीं करता । जैसे, मधु और घी का समान मात्रा में संयोग मारक है, पृथक् पृथक् नहीं । इसी प्रकार मछली और दूध का संयोग कुछ रोग को उत्पन्न करता है, पृथक् पृथक् नहीं ॥२३॥ राशिस्तु सर्वग्रहपरिग्रहौ, मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः । तत्र सर्वस्याऽऽहारस्य प्रमाणग्रहणमेकपिण्डेन सर्वग्रहः । परिग्रहश्च पुनः प्रमाणग्रहणमेकैकत्वेनाऽऽहारद्रव्याणाम् । सर्वस्य हि ग्रहः सर्वग्रहः । सर्वतश्च ग्रहः परिग्रह उच्यते ॥ २४ ॥ ( ४ ) राशि—दो प्रकार की होती है । ( १ ) सर्वग्रह और ( २ ) परिग्रह । राशि का प्रयोजन मात्रा और अमात्रा अर्थात् कम या अधिक मात्रा में भोजन या औषध के लेने से उत्पन्न अच्छे या बुरे परिणाम का निश्चय करना है । सम्पूर्ण आहार को एक पिण्ड की मात्रा में ग्रहण करने का नाम 'सर्वग्रह' है । आहार द्रव्यों को एक एक करके नियत प्रमाण में १. पानी से बार बार धोने पर पदार्थ के गुण बदल जाते हैं । यथा— 'सुधौतः, प्रस्रुतः, स्विन्नः, संतप्तश्चौदनो लघुः ।' मथने से—दधि शोथ करती है, [ मथने पर स्नेह होने पर भी शोथघ्न है । पात्र में—चांदी के पात्र में दही, [ के पात्र में पानी रखना उत्तम है । काल के कारण पन्द्रह दिन के पीछे या पिये । देशमें—राख के ढेर में रक्खे ।