चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४३ तेईसवां योग— वाते सरक्ते सघृतः प्रदेहो गोधूमचूर्णं छागलीपयश्च । गोधूम ( गेहूँ ) के चूर्ण को बकरी के दूध और घी के साथ मिलाकर लगाने से वातरक्त रोग मिटता है । यहां भी दूध में गेहूँ के चूर्ण के साथ घी सिद्ध कर लेना चाहिये । चौबीसवां योग— नतोत्पलं चन्दनकुष्ठयुक्तं शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहः ॥ २३ ॥ 'नत' ( तगर ), उत्पल ( नीला कमल ), चन्दन, कुष्ठ (कूट) इनके चूर्ण को घी में मिलाकर शिर पर लगाने से शिर की पीड़ा मिटती है ॥ २३ ॥ पच्चीसवां योग— प्रपौण्डरीकं सुरदारु कुष्ठं यष्ट्याह्वमेला कमलोत्पले च । शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहो, लोहैरकापद्मकचोरकैश्च ॥ २४ ॥ प्रपौण्डरीक ( पुण्डरीक काष्ठ ), सुरदारु ( देवदारु ), कुष्ठ ( कूट ) यष्ट्याह्न ( मुलेहठी ), एला ( इलायचो ), कमल ( श्वेत कमल, कमल गट्टा), उत्पल ( नीला कमल ), लोह ( अगर ), ऐरक (रोहिष घास), पद्मक (पद्माख) और चोरक ( चोरपुष्पी, सुगन्धित द्रव्य है, पर्वतीय लोग दाल आदि में गेरते हैं ), इनको घो में मिलाकर शिर दुखने पर माथे में लगाने से आराम मिलता है। यहां पर पीसने के लिये पानी मिला लेना चाहिये ॥ २४ ॥ छब्बीसवां योग— रास्ना हरिद्रे नलदं शताह्वे द्वे देवदारूणि सितोपला च । जीवन्तिमूलं सघृतं सतैलमालेपनं पार्श्वरुजासु कोष्णम् ॥२५॥ रास्ना, दोनों हरिद्रा ( हल्दी और दारु हल्दी ), नलद ( जटामांसी ), दोनों शताह्वा ( सौंफ और सोया ), देवदारु, सितोपला ( मिश्री ), जीवन्ती का मूल, इनके चूर्ण को घृत और तैल (तिल का तैल) में (ये घी तैल दोनों परस्पर समान भाग हों ) मिलाकर गरम करके पार्श्व शूल में लेप करना चाहिये ॥२५॥ सत्ताईसवां योग— शैवालपद्मोत्पलवेत्रतुङ्गं प्रपौण्डरीकाण्यमृणाललोध्रम् । प्रियङ्गुकालीय कचन्दनानि निर्वापणः स्यात्सघृतः प्रदेहः ॥२६॥ शैवाल ( सरवाल ), पद्म ( पद्माख ), उत्पल ( नील कमल ), वेत्र ( श्रेष्ठ वेत, लोटी बेत ), तुंग ( कमल का केशर ), प्रपौण्डरोक ( पुण्डरीक ), अमृणाल (खस), लोध्र (पठानी) प्रियंगू (फूल प्रियंगु), काळीयक (चन्दन भेद,