चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४४ चरकसंहिता [ अ० ३ हरि चन्दन), और चन्दन इनको (पानी में पीस कर) सब द्रव्यों के समान घी मिलाकर लेप करने से त्वचा का दाह, आग से जले की जलन शान्त होती है ॥२६॥ अट्ठाईसवां योग— सितालतावेतसपद्मकानि यष्ट्याह्वमैन्द्री नलिनानि दूर्वा । यवासमूलं कुशकाशयोश्च निर्वापणः स्याज्जलमेरका च ॥२७॥ सिता (श्वेत दूब), लता (प्रियंगू या सारिवा), वेतस (जल वेतस), यष्टि (मुल्हट्टी), ऐन्द्री, 'नलिन' (नीला कमल), दूर्वा (दूब), यवासमूल (धमासे की जड़), कुश (दाभ), काश की जड़, जल (बालक), ऐरक (होगला) इनको जल के साथ पीसकर लेप करने से त्वचा की जलन शान्त होती है। कोई सिता से मिश्री और लता से मजीठ का ग्रहण करते हैं ॥२७॥ उनतीसवां तथा तीसवां योग— शैलेयमेलाऽगुरु चाथ कुष्ठं चण्डा नतं त्वक्सुरदारु रास्ना । शीतं निहन्यादचिरात् प्रदेहो, विषं शिरीषस्तु ससिन्धुवारः ॥ २८ ॥ शैलेय (छड़ीला), इला (इलायची) अगर, कुष्ठ (कूठ), चण्डा (चोर पुष्पी), नत (तगर), त्वक् (दालचीनी), सुरदारु (देवदार), रासना, इनको पानी में पीस कर लेप करने से शीत, ठण्डक नष्ट होती है। तीसवां योग—'शिरीष' (सिरस) को सिन्धुवार (सम्भालु के पत्ते) के साथ पीसकर मलने से विष दोष नष्ट होता है ॥ २८ ॥ इकतीसवां योग— शिरीषलामज्जकहेमलोध्रैस्त्वग्दोषसंस्वेदहरः प्रघर्षः । शिरीष (सिरस), लामज्जक (उशीर, खस), हेम (नागकेसर), लोध्र (पठानी लोध), इनको चूर्ण बनाकर शरीर पर रगड़ने से त्वचा के रंग एवं पसीने का अधिक आना नष्ट होता है। बत्तीसवां योग— पत्राम्बुलोध्राभयचन्दनानि शरीरदौर्गन्ध्यहरः प्रदेहः ॥२६॥ पत्र (तेजपात), अम्बु (नेत्रवाला), लोध्र (पठानी लोध), अभय (उशीर, खस), और श्वेत चन्दन इनको पानी में पीसकर लेप करने से शरीर की दुर्गन्ध मिटती है ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकः । इहात्रिजः सिद्धतमानुवाच द्वात्रिंशतं सिद्धमहर्षिपूज्यः । चूर्णप्रदेहान्विविधामयघ्नानारग्वधीये जगतो हितार्थम् ॥३०॥