चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४६ चरकसंहिता [ अ० ४ वृद्धोमशतं प्रणीतं दशापरे चात्र भवन्ति योगाः, चतुरङ्गुलो द्वादशधा योगमेति, लोध्रं विधौ षोडशयोगयुक्तं, महावृक्षो भवति विंशतियोग- युक्तः, एकोनचत्वारिंशत्सप्तलाशङ्खिन्योर्योगाः, अष्टचत्वारिंशद्दन्तीद्रव- न्त्योरिति षड्विरेचनशतानि ॥ ५ ॥ मदन फल के कल्प में १३३ विरेचन योग, 'जीमूतक' (वन्दाल) फल के कल्प में ३६, ईक्ष्वाकु (कडवी तुम्बी) कल्प में ४५, धामार्गव (बड़ी तुरई पीले फूल की, राज कोषातकी) कल्प में ६०, कुटज (कूड़े) के फल कल्प में १८ प्रकार के, कृतवेधन (कडुवी तोरी) के उपयोग में विरेचन योग ६०, इस प्रकार से ये वमन रूप विरेचन योग हैं। अब अधोगामी विरेचन योग कहते हैं- श्यामा (अरुणमूल) की निशोथ और त्रिवृत् (सफेद निशोथ) कल्प के ११० योग, चतुरङ्गुल (अमलतास) कल्प के १२ प्रकार के योग, लोध्र विधि (लोध्र कल्पों में विरेचन विधि) के अन्दर १६ योग, महावृक्ष (स्नुही, सुधा वृक्ष) कल्प में २०, सप्तला और शंखिनी (शिकाकाई) के कल्प में ३६ और दन्ती (जमालघोटा), द्रवन्ती के ४८ प्रकार के योग हैं। इस प्रकार से ६०० विरेचन योग बन जाते हैं ॥ ५ ॥ षड्विरेचनाश्रया इति क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलानीति ॥६॥ विरेचन क्रिया ओषधियों के छः (अंगों में) आश्रय है। यथा-क्षीर (दूध), मूल, त्वक्-त्वचा, पत्र, पुष्प और फल ॥ ६ ॥ पञ्च कषाययोनय इति मधुरकषायोऽम्लकषायः। कटुकषायस्तिक्त- कषायः कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा ॥ ७ ॥ 'कषाय' की पांच योनि (जातियां) हैं। यथा-मधुरकषाय (मधुर रस वाले पदार्थों से बना हुआ कषाय), अम्लकपाय (खट्टे रस वाले पदार्थों से बनाया हुआ कषाय), कटुकषाय (कडुवे रसवाले पदार्थों से तय्यार किया कषाय), तिक्तकषाय (तीखे पदार्थों से तय्यार किया हुआ कषाय), कषायकषाय (कसैले पदार्थों से तय्यार किया हुआ कषाय) इन पांचो को इस शास्त्र में 'कषाय' संज्ञा है, 'लवण' कषाय नहीं है लवण रस से कषाय तैयार नहीं होता है ॥ ७ ॥ पञ्चविधं कषायकल्पनमिति, तद्यथा स्वरसः कल्कः शृतः शीतः फाण्टः कषाय इति ॥ ८ ॥ कषायकल्पन अर्थात् कषाय तैयार करने की विधि पांच प्रकार से है। यथा- स्वरस, कल्क शृत, शीत और फाण्ट। कषाय शब्द सबके साथ संयुक्त है ॥८॥