चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४७ कषायों के लक्षण— ( यन्त्रप्रपीडनाद् द्रव्याद्रसः स्वरस उच्यते । यत्पिण्डं रसपिष्टानां तत्कल्कं परिकीर्तितम् ॥ ९ ॥ वह्नौ तु कथितं द्रव्यं शृतमाहुश्चिकित्सकाः । द्रव्यादपोथितात्तोये प्रतप्ते निशि संस्थितात् ॥ १० ॥ कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः । क्षिप्तोष्णतोये मृदितं तत्फाण्टं परिकीर्तितम् ॥ ११ ॥ ) तेषां यथापूर्वं बलाधिक्यम् , अतः कषायकल्पना व्याध्यातुर्बला- पेक्षिणी । नत्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति ॥ १२ ॥ स्वरस कषाय —द्रव्य को कूट कर यंत्र प्रपीड़न अर्थात् यंत्र से वा हाथ आदि से दबा कर जो रस निकलता है उसे 'स्वरस' कहते हैं कल्क कषाय—रस सहित द्रव्य को शिला आदि पर पीस कर जो गोला बना लिया जाता है उसे 'कल्क' कहते हैं । शृत कषाय अग्नि में उबाले हुए द्रव्य को वैद्य 'शृत' कहते हैं । बहुत गरम जल में रात भर रक्खे हुए कूटे हुए द्रव्य से जो कषाय निकलता है उसे 'शीत' कहा जाता है। फाण्ट कषाय—द्रव्य को कूटकर गरम पानी में रखकर कुछ काल पीछे मलकर जो किट्ट रहित सार- भाग निकलता है, उसे 'फाण्ट' कहते हैं । इन में स्वरस में कल्क की अपेक्षा, कल्क में शृत की अपेक्षा से, शृत में शीत की अपेक्षा से, और शीत में फाण्ट की अपेक्षा से अधिक बल, सामर्थ्य और शक्ति है । इसलिये 'कषाय कल्पना' अर्थात् रोगी के लिये कषाय का विचार व्याधिबल, आतुरबल अर्थात् रोगी के सामर्थ्य को देखकर करना चाहिये। ये सब कषाय सब अवस्थाओं में उपयोगी नहीं होते अर्थात् बलवान् व्याधि या बलवान् रोगी में अल्प बल वाले या मध्यम बल वाले कषाय कार्य करने में समर्थ नहीं होते । इसी प्रकार अल्प बल की अवस्था में अधिक बल वाले कषाय कार्य करने में असमर्थ होते हैं । ॥ ९–१२ ॥ पञ्चाशन्महाकषाया इति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा— पहिले जो यह कहा है कि पचास महाकषाय हैं, उनकी अब व्याख्या करते हैं । जैसे— जीवनीयो बृंहणीयो लेखनीयो भेदनीयः संधानीयो दीपनीय इति षट्कः कषायवर्गः । ( जीवनीय ) जीवन के लिये हितकारी आयुवर्धक, (बृंहणीय) शरीर के