चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context६० चरकसंहिता [ अ० ७ तत्र श्लोकाः—शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिन्नमामयैः । यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ २८ ॥ वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् । देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये ॥ २९ ॥ परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया । मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च ॥ ३० ॥ नवको निर्णयश्चास्य विधिवत्संप्रकाशितः । तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा ॥ ३१ ॥ शरीर जिस प्रकार से रहता है, जिस प्रकार से क्लेश या विनाश को प्राप्त होता है, शरीर के धातु, इन धातुओं की वृद्धि और ह्रास क्षीण धातुओं का औषध, देह की वृद्धि करनेवाले और बल को बढ़ाने वाले कारण, परिणाम- कारक भाव, इनकी पृथक् पृथक् क्रिया, मल और प्रसाद रूप धातु, नव प्रश्न तथा इन प्रश्नों का समुचित निर्णय 'शरीर विचय' नामक अध्याय में परमर्षि आत्रेय ने प्रकाशित किया है ॥ २८-३१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचय- शारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ सप्तमोऽध्यायः । अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'शरीरसंख्या' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ शरीरसंख्यामवयवशः (कृत्स्नं) शरीरं प्रविभज्य सर्व-शरीर- संख्यान-प्रमाण-ज्ञान-हेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥ अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से सम्पूर्ण शरीर की संख्या, परिमाण और नाम आदि ज्ञान करने के लिये अवयव रूप में शरीर का विभाग करके शरीर संख्या नाम शारीर प्रकरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया— तमुवाच भगवानात्रेयः—शृणु मत्तोऽग्निवेश ! सर्वशरीरमभिवक्षा- णायथाप्रश्नमेकमना यथावत् ॥ ४ ॥