चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ७ ] शरीरस्थानम् ६१ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! सम्पूर्ण शरीर के प्रकरण को उपदेश करते हुए मुझ से अपने प्रश्न के अनुसार एकाग्र चित्त होकर सुनो ॥ ४ ॥ शरीरे षट् त्वचः । तद्यथा—उदकधरा त्वग्बाह्या, द्वितीया त्वग- सृग्धरा, तृतीया सिध्म-किलास-सम्भवाधिष्ठाना, चतुर्थी दद्रुकुष्ठसम्भवा- धिष्ठाना, पञ्चम्यलजी-विद्रधी-सम्भवाधिष्ठाना, षष्ठी तु यस्यां छिन्नायां ताम्यत्यन्ध इव च तमः प्रविशति, या चाप्यधिष्ठायारूषि जायन्ते पर्वसु कृष्णरक्तानि स्थूलमूलानि दुश्चिकित्स्यतमानि येति षट् त्वचः । एताः षडङ्गं शरीरमवतत्य तिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ शरीर की छः त्वचाएं—शरीर में छ त्वचाएं हैं । जैसे—(१) बाह्य त्वचा उदकधारा जिसमें जल रहता है । ( २ ) दूसरी त्वचा असृग्धारा जिसमें रुधिर रहता है । ( ३ ) तीसरी त्वचा जो सिध्म, किलास आदि रोगों की उत्पत्ति का आश्रय स्थान है । ( ४ ) चौथी त्वचा जो दद्रु ( दाद ) और कुष्ठ ( कोढ ) रोग का आश्रय है । ( ५ ) पाचवीं त्वचा जो अलजी और विद्रधिरोग का आश्र- यभूमि है । ( ६ ) छठी त्वचा जिसके कटने पर पुरुष मूर्छित होता है और अन्धे की भांति अन्धकार में घुसता है—उस कुछ नहीं दीखता और जिस त्वचा का आश्रय लेकर अवयव सन्धियों में काले, लाल, स्थूल मूल वाले ऐसे व्रण उत्पन्न होते हैं जिनकी चिकित्सा करना बहुत कठिन होता है । ये छः त्वचायें छ. अगों वाले शरीर कोढके रहती हैं१ ॥ ५ ॥ तत्रायं शरीरस्याङ्गविभागः । तद्यथा—द्वौ बाहू, द्वे सक्थिनी, शिरो ग्रीवं, अन्तराधिरिति षडङ्गमङ्गम् ॥ ६ ॥ शरीर के छः अग—शरीर के अगों का विभाग इस प्रकार से है जैसे—दो बाहुए, दो टागें, शिर, ग्रीवा और बीच का मध्य भाग, ये छः अग हैं ॥ ६ ॥ त्रीणि २षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नां सह ३दन्तोलूखलनखैः । तद्यथा—द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः विंशतिः १ सुश्रुत में सात त्वचायें और ३०० अस्थिया मानीं हैं । २ षष्ठानि इति च पाठः । ३ 'द्वात्रिंशद्दन्ताः, द्वात्रिंशद्दन्तोलूखलानि, विंशतिर्नखाः, षष्टिः पाणिपादाङ्गु- ल्यस्थीनि, विंशतिः पाणिपादशलाका, चत्वारि पाणिपादशलाकाधिष्ठानानि, द्वे पाष्ण्र्योरस्थिनी, चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, द्वौ मणिकौ हस्तयोः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयो., द्वे जानुकपालिके, द्वावूरुनलकौ, द्वौ बाहुनलकौ, द्वावंसौ, द्वे