चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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६२ चरकसंहिता [ अ० ७
पाणिपादशलाकाः, चत्वार्यधिष्ठानान्येषां, चत्वारि पाणिपादपृष्ठानि,
षष्टिरङ्गुल्यस्थीनि, द्वे पाष्ण्योः, द्वे कूर्चाधः, चत्वारः पाण्यौर्मणिकाः,
चत्वारः पादयोर्गुल्फाः, चत्वार्यरत्न्योरस्थीनि, चत्वारि जङ्घयोः, द्वे
जानुनोः, द्वे कूर्परयोः, द्वे ऊर्वोः, द्वे बाह्वोः, सांसयोर्द्वे, द्वावक्षकौ, द्वे
तालुनी, द्वे श्रोणिफलके, एकं भगास्थि, पुसां मेढ्रास्थि एक, त्रिकसंश्रि-
तमेकं गुदास्थि, पृष्ठगतानि पञ्चत्रिंशत्, पञ्चदशास्थीनि ग्रीवायाँ, द्वे
जत्रुणी, एकं हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, द्वे ललाटे, द्वे अक्ष्णोः, गण्ड-
योर्द्वे, नासिकाया त्रीणि घोणाख्यानि, द्वयोः पार्श्वयोश्चतुर्विंशति पञ्ज-
रास्थीनि च पार्श्वकानि, तावन्ति चैषा स्थालिकान्यर्बुदाकाराणि तानि
द्विसप्ततिः, द्वौ शङ्खकौ, चत्वारि शिर कपालानि, वक्षसि सप्तदश, इति
त्रीणि षष्ट्यधिकानि शतान्यस्थ्नामिति ॥ ७ ॥
तीन सौ साठ हड्डिया—दात, दन्त कोशों और नखों को मिला कर
इस शरीर मे तीन सौ साठ अस्थिया हैं । जैसे—३२ दात,, ३२ दातो के उलू-
खल (कोश), २० नख, २० हाथ और पावों की शलाकाएं, ६० हाथ पाव
की अगुलियों की अस्थिया, ४ हाथ और पावों की पीठ की हड्डिया, ४ इन शला-
काओं के आश्रयस्थान । ६० अगुलियों की हड्डिया, २ पाष्णियों (एडियों) की,
२ कूर्चाध । ४ पावों में गुल्फ, २ हाथों के मणिक, ४ प्रकोष्ठ की अस्थियों,
४ टागो की अस्थिया, २ जानुकपाल, २ कूर्पर, २ जाघों की अस्थिया, २ बाहु
की अस्थिया, २ कन्धे की अस्थिया, २ असफलक, २ अक्षक, २ तालु की
अस्थिया, २ श्रोणिफलक (कूल्हे की हड्डिया), १ भगास्थि, १ पुरुषों के लिंग
की अस्थि, त्रिक (कूलहों) के नीचे का आश्रय रूप गुदा के पास १ अस्थि,
३५ पीठ की अस्थिया, १५ अस्थिया गर्दन में, २ जत्रु (हसली) की हड्डी, १
ठोड़ी की अस्थि, ठोड़ी के मूल में बाधने वाली २ अस्थि, ललाट की २ अस्थिया,
२ आँख की, २ कपोलों (गालों) की, ३ अस्थि नासिका में है जिनका नाम
'घोण' है, दोनों पाश्र्वों की २४ अस्थिया, पञ्जर की और पसलिया, उतने ही उनके
असफलके, द्वावक्षकौ, एक जत्रु, द्वे तालुषके, द्वे श्रोणिफलके, एक भगास्थि,
पञ्चचत्वारिंशत्पृष्ठगतान्यस्थीनि, पञ्चदश ग्रीवाया, चतुर्दशोरसि, द्वयोः पार्श्वयोश्च-
तुर्विंशतिः, पार्श्वयोस्तावन्ति चैव स्थालकानि, तावन्ति चैवस्थालकार्बुदानि, एक
हन्वस्थि, द्वे हनुमूलबन्धने, एकास्थि नासिकागण्डकूटललाट, द्वौ शङ्खौ, चत्वारि
शिरःकपालानीति, एव त्रीणि षष्ठानि शतान्यस्थ्ना सह दन्तनखेनेति' च पाठः ।