चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३ पुत्रेष्टि यज्ञ की विधि समाप्त होने पर प्रथम दक्षिण पाव को आगे रख कर स्त्री अग्नि की प्रदक्षिणा करे। इसके पीछे ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराके पति के साथ अवशिष्ट आज्यशेष (बचा हुआ घी) खावे। इसमे भी पहिले पुरुष खाये और पीछे स्त्री। अवशिष्ट कुछ भी शेष न रक्खे। दोनो परस्पर अगले आठ रात्रि शयन करे। जिस प्रकार के पुत्र को कामना हो उसी प्रकार के ( वर्ण ) के वस्त्र पहिने। इससे मनोवाञ्छित सतान उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥ या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहु च पुत्रमाशासीत, या वा कृष्णं कृष्ण-मृदु-दीर्घ-केशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मव- न्तम्। एष एवानयोरपि होमविधिः। किंतु परिवर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रव- र्णानुरूपस्तु यथाशीः परिवर्होऽन्यः कार्यः स्यात् ॥ ६ ॥ जो स्त्री काले, लाल आखों वाले, चौड़ा छाती और विशाल बाहु वाले पुत्र की कामना करे, अथवा काले रग के, काले, कोमल लम्बे २ बालों वाले, सफेद आख के, सफेद दातों वाले, तेजस्वी और जितेन्द्रिय पुत्र को चाहे तो इन दोनों के लिये भी यही विधि है। किन्तु शयन, आसन, पुष्प आदि परिच्छद भिन्न हैं। जैसे वर्ण के पुत्र की चाह हो वैसा ही परिच्छद पोशाक और बिछावन करे। इष्ट पुत्र के वर्ण के अनुरूप सब वस्त्रादि होना चाहिये ॥ ६ ॥ शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्याद्देवाग्नि द्विज गुरु-तपस्वि-सिद्धेभ्यः ॥१०॥ शूद्रा स्त्री मन्त्र-विधि से होम न करके देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, सिद्ध और तपस्वियों को नमस्कार मात्र ही करे [ क्योंकि शूद्रा मूर्ख होने से यज्ञादि ठीक प्रकार से करने मे असमर्थ होती है ] ॥ १० ॥ या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिष- मनुनिशम्य तान्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत् । ताननुपरिक्रम्य या या येषां येषा जनपदाना मनुष्याणामनुरूप पुत्रमाशासीत सा सा तेषा तेषां जनपदानामाहार-विहारोपचार-परिच्छदाननुविधत्स्वेति वाच्या स्यात्। इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषा समृद्धिकर कर्म व्याख्यातं भवति ॥११॥ जो जो स्त्री जिस जिस प्रकार के पुत्र की इच्छा करे उस उस की उस उस प्रकार के पुत्र की इच्छा को सुन कर उन नाना जनपदों में उस स्त्री को मन द्वारा भ्रमण करावे, उनका अनेक बार चिन्तन कराये। जो जो स्त्री जिन २ जनपदों के राष्ट्रनिवासियोँ के सदृश पुत्र को चाहे वह इन देशवासियों जैसा जैसा आहार-विहार, उपचार, परिच्छद आदि करते हैं वैसा