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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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१०४ चरकसंहिता [ अ० ८ करने को कहे । यह सब पुत्र को चाहने वाली स्त्रियों के आशानुरूप समृद्धि करने वाले पुत्र के अनुकूल कर्म का उपदेश कर दिया है ॥ ११ ॥ न तु खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति, अपि खलु तेजोधातुरप्युदकान्तरिक्ष-धातु-प्रायोऽवदात-वर्णकरो भवति । पृथिवी- वायु-धातु-प्रायः कृष्णवर्णकरः सम-सर्व धातु-प्रायः श्यामवर्णकरः ॥१२॥ केवल इतना ही कर्म वर्ण की विशेषता को उत्पन्न नहीं करता । बल्कि तेजो धातु, जल और अन्तरिक्ष धातु अधिक मात्रा में वर्ण को चमकीला, स्वच्छ कान्तिमान् बनाते हैं। यही तेजो धातु पृथ्बी, वायु की अधिकता के कारण वर्ण को काला कर देता है । सब धातुओं की समान मात्रा वर्ण को श्याम (सावला) करती है ॥ १२ ॥ सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्व- ल्न्याः श्रुतयश्चाभीक्ष्णं स्वोचितं च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ॥१३॥ उन उन प्राणियों के माता पिता के सत्त्व, गर्भिणी का सत्त्व, बार बार बातों का सुनना, गर्भ के पूर्व जन्म के सचित कर्म, जन्मान्तर में जिस प्रकार के सत्त्व का पुरुष अभ्यास करता है यह बातें सत्त्व (मन) की विशेषता को उत्पन्न करती हैं ॥ १३ ॥ यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोर्मिश्रीभावमापन्नयो शुक्रं शोणितेन सह समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावानुपहतायामप्रदुष्टे- गर्भाशये गर्भमभिनिर्वर्तयत्येकान्तेन । तद्यथा निर्मले वाससि सुपरि- कल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत् । यथा वा क्षीरं दध्नाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधि- भावं शुक्रं तद्वत् ॥ १४ ॥ उपरोक्त विधि के अनुसार संस्कृत शरीर वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर सयुक्त होने पर शुक्र आर्तव के साथ मिल कर निर्दोष शुक्र निर्दोष आर्तव से, नीरोग- स्वस्थ योनि में मिल कर, निर्दोष गर्भाशय में-सम्पूर्ण रूप में गर्भ को बनाता है। जिस प्रकार निर्मल, स्वच्छ, अच्छी प्रकार से धोये वस्त्र पर थोड़ा सा भी उत्तम रंग गिरने पर रंग चढ़ा देता है, उसी प्रकार शुद्ध निर्मल गर्भाशय में निर्दोष शुक्र आर्तव से मिल कर गर्भ को उत्पन्न कर देता है। जिस प्रकार थोड़ी सी दही, बहुत से दूध के साथ मिल कर उसको भी दही रूप में कर देती है, उसी प्रकार थोड़ा सा शुक्र भी गर्भ को स्वभावतः उत्पन्न कर देता है ॥ १४ ॥ एवमभिनिर्वर्त्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः ॥ १५ ॥

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